अमृत कृषी करके देखे

 

मालपानी ट्रस्ट

 

संकलनकर्ता- दीपक सचदे

 

प्रकाशक- मालपानी ट्रस्ट, गांव-बजवाड़ा, पो-नेमावर

तालुका-खातेगांव, जिला-देवास (.प्र.) ४५५३३९

 

प्रेरणास्रोत- श्री एस.. दाभोलकर

प्रकाशन दिनांक- २१ अक्टूबर २००९

 

संपर्क- दीपक सचदे, मालपानी ट्रस्ट, गँाव-बजवाड़ा, पो-नेमावर,

तालुका-खातेगँाव, जिला-देवास (.प्र.) ४५५३३९

फोन नं - ९३२९५७०९६०, ९८२६०५४३८८

(०७२७४) २८९२०९, (०७२७४) २८९२१०

Email deepaksuchde@gmail.com

Website natuecofarmingscience.com

प्रस्तावना

करीब २० साल से श्री दाभाोलकर जी प्रेरित सृजन-विज्ञान (नेच्युको फार्मिंग सांइस) के सतत्‌ अभ्यास के पश्चात लोगों की मँाग आने से इस विज्ञान की कार्यपद्धति को शब्ददेह देने का यह नम्र प्रयत्न है। इसे पढ़ने के पश्चात्‌ जो सुझाव आप देना चाहें उनका स्वागत है और उसे दुरुस्त किया जाएगा।

...दीपक सचदे

भूमिका

वातावरण में बदलावों की श्रृंखला आरंभ हो चुकी है। इसके शुरुआती नतीजे खेती की प्रक्रियाओं पर बुरा असर डालते दिखाई दे रहे हैं। बरसात के समय और उसकी मात्रा में बदलावों से किसान परेशान हो रहे हैं। दूसरी ओर खेती में दिन--दिन खर्च बढ़ता जा रहा है और इससे होने वाली कमाई किसानों को अपर्याप्त लग रही है। छोटे और मध्यम किसान खेती को जोखिम भरा व्यवसाय बताकर इसे छोड़ रहे हैं। यही कहानी आगे बढ़ती रही तो मानव सहित सभी प्राणियों को उचित एवं पर्याप्त भोजन मिलना मुश्किल होता जाएगा। सीधे शब्दों में कहें तो सारी दुनिया के लिए खाद्य सुरक्षा एक गंभीर संकट बन जाएगा। इस संकट से निपटने के लिए पूर्व तैयारी करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

वातावरण में बदलावों के बारे में दुनियाभर में जागरुकता तेजी से फैल रही है। बहुत सारी संस्थाएँ और समूह इन बदलावों का सामना करने और इनके मुताबिक मानव समुदायों को ढालकर उन्हें सुरक्षित रखने के उपायों की तला और प्रचार कर रहे हैं। 'मालपानी ट्रस्ट' ने भी सृजन संस्कृति की खेती के शाश्वत तरीकों पर कुछ प्रयोग करके देखे हैं। ये प्रयोग विश्वास जगाते हैं कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के प्राकृतिक साधनों का इस्तेमाल कर खुद की एवं अपने परिवार की खाद्य सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करने के प्रयत्न कर सकता है।

वातावरण में बदलावों का दौर जब तक थमता नहीं है तब तक शाश्वत खेती के तरीकों को दोहराते रहना और इनके अनुभवों को एक-दूसरे के साथ बांटना बहुत जरुरी है। ऐसा करने से सभी को गलतियां जल्दी समझने, सुधारने और बेहतर तरीके खोजने में मदद मिलेगी। पुस्तिका के रुप में हमारा यह प्रयास इसी दिशा में पहला कदम है।

...डॉ. ना. मालपानी

ट्रस्टी, मालपानी ट्रस्ट

अभिनंदन

मानव समाज की समृद्धि के लिए खेती की समृद्धि बहुत जरुरी है और खेती की समृद्धि के लिए पर्याप्त पानी आवश्यक है। मालपानी ट्रस्ट के कामों से अब तक सैकड़ों गाँवों में खेती की इस पद्धति की प्रक्रिया बढ़ी है, और बढ़ रही है। लेकिन खेती में पानी का जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से न केवल पानी की बर्बादी होती है बल्कि उपजाऊ मिट्टी भी बर्बाद होती है। इसके नतीजे उपजाऊ जमीन के नमकीन होने, दलदल बनने और बंजर बनने के रुपों में सामने आए हैं। अतः खेती के ऐसे तरीके खोजने की आवश्यकता है जो पानी और उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी को रोकें और इनके बेहतर उपयोग से पर्यावरण को समृद्ध बनाएँ।

यह बहुत खुी की बात है कि 'मालपानी ट्रस्ट' के विद्यार्थियों और शिक्शकों ने ऐसे उपायों का पता लगाकर उन पर प्रयोग ुरु किए हैं। उनके प्रयोगों और अनुभवों पर आधारित इस पुस्तिका से पर्यावरण के साथ मिलकर समृद्धि हासिल करने के इच्छुक लोगों को मदद मिलेगी। इसी ुभकामना के साथ ' मालपानी ट्रस्ट' के सभी विद्यार्थियों और िक्षकों का अभिनंदन जिन्होंने शाश्वत जीवन और रोजगार के तरीकों को खुद करके सीखने, सिखाने और अपनाने का संकल्प लिया है।

.दिने कोठारी, सी.. इंदौर   

प्रयोगों की पृष्ठभूमि

'मालपानी ट्रस्ट' के द्वारा संचालित कृषि तीर्थ पर किसानों और ुभेच्छुओं को सृजन संस्कृति आधारित शाश्वत खेती करने के तरीकों की शुरुआत मार्च २००६ में की थी। आज तक कई लोगों, संस्थाओं, शासकीय अधिकारियों एवं कृषि विद्यापीठ के कुलपति और कृषि सेवा से जुड़े कई युवकों ने तथा आज के नई पीढ़ी के युवा वर्ग ने जो जीवन की दिशा खोज रहे हैं, कृषि तीर्थ में आए, अभ्यास किया और इस दिशा में आगे बढ़े। उन सभी की एक ही मँाग थी कि इस विज्ञान को हिन्दी में विज्ञान को प्रगट किया जाए जो संदर्भ के लिए उपयोगी हो सके। इसे नजर में रखते हुए यह किताब आपके सामने आ रही है।

समाज में बढ़ती असमानता, गरीबी और रोगों की वृद्धि देखकर मालपानी ट्रस्ट ने श्री दाभोलकर जी प्रेरित सृजन संस्कृति आधारित खेती के इस प्रयोग की शुरुआत की और इसके कारण कई लोगों को नया जीवन जीने की प्रेरणा मिली है। इसी पृष्ठभूमि के साथ देश और दुनियाँ के सभी ोधकों को नई दिशा मिले, इसी उद्देश्य्य से इस कृषि आधारित यज्ञ की नई जीवनैली प्रस्तुत की जा रही है।

आभार

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक के. एस.सुदर्शन जी ने इस पुस्तिका की भाषा को सुबोध बनाने में सहयोग देकर हमें अनुग्रहित किया है। वॉटरेड ऑर्गनाइजेन ट्रस्ट, अहमदनगर के 'माइक्रो फार्मिंग एंड लो एक्सटर्नल इनपुट सस्टेनेबल एग्रीकल्चर' प्रकल्प के सलाहकार श्री हिमांु खोले ने इस पुस्तिका के लेखन, संपादन और सजावट में मूल्यवान सहयोग दिया है। वॉटरशेड ऑर्गनाइजेन ट्रस्ट, अहमदनगर की वेबसाइड पर उपलब्ध ई-बुकलेट 'खुद करके सीखो' पर यह पुस्तिका आधारित है। रजनी कहार ने इस पुस्तिका के संपादन में मूल्यवान सहयोग किया।

मुंबई की श्रीमती प्रीति पाटिल (९८१९१९७०७१) ने अमृत मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने में मूल्यवान सहयोग दिया। इनके साथ ही सृजन संस्कृति आधारित तरीकों से खेती करने वाले इन सभी किसानों का सहयोग प्राप्त हुआ-

श्री जीतू भाई, मालेगांव, नाशिक (९४२०६९२६४५)

श्री सुील वाजपेई, (९४२३७९०५२७)

श्री राजिन्दर रैना, चारोली पुणे (९८२२०६८३८२)

वसंत करुणा फुटाणे, रवाला अमरावती (९५७२२९-२३८१७१)

सुभाष र्मा, यवतमाल (९४२२८६९६२०)

वासुदेव काठे, कसबे सुकेणे नािक (०२५५०-७९२६५)

हम इन सभी के हृदय से आभारी हैं।

दीपक सचदे

मुख्य कार्यकारी अधिकारी,

मालपानी ट्रस्ट बजवाड़ा, देवास म.प्र.

 

विषय सूची

१ः सृजन खेती का परिचय

२ः अमृत मिट्टी बनाने के तरीके और उसकी देखभाल

३ः पौधों के अंगों और उनके कार्यों का प्रबंधन

४ः अन्य प्रभावकारी संकल्पनाएँ

५ः परिशिष्ट

 

.सृजन खेती का परिचय

सृजन खेती क्या है ?

वातावरण में बदलावों के अनुरुप तुलनात्मक रुप से कम जगह, कम पानी में आसपास के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए शाश्वत तरीकों से खेती करना ही सृजन खेती है। इसका लक्ष्य है पर्यावरण की सुरक्षा और समृद्धि के साथ-साथ परिवार को खाद्य सुरक्षा और संपन्नता प्राप्त हो तथा किसी का शोषण न होते हुए सभी को समानता और सही अर्थों में स्वतंत्रता प्राप्त हो। साथ ही यह खेती के शाश्वत तरीकों से जुड़े प्रयोगों का एक समूह है।

 

सृजन खेती के उद्देश्य्य क्या हैं?

खेती के इस तरीके से बाजार पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण के हित में निम्न उद्देश्य्यों को हासिल करने की कोशशि की जाती है-

१ः उपयोगी पौधों के द्वारा ज्यादा से ज्यादा सूर्यप्रका खाद्य एवं उपयोगी पदार्थों में जमा करना।

२ः कम पानी में ज्यादा सूखा जैवभार (जैविक कचरा) जमा करना।

३ः अपने बीज, अपना खाद और अपने जल का सुनियोजन करना।

४ः पेट्रोलियम पदार्थों से चलने वाले यंत्रों और तैयार होने वाली सामग्री का प्रयोग न करना।

५ः परिवार के लिए आवश्यक औषधियों, सब्जियों, फलों, मसालों, तिलहन, धागा, जलावन, दालों और अनाज का उत्पादन स्वयं करना।

सृजन खेती को शाश्वत बनाने के लिए किन मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है?

इसे शाश्वत बनाने के लिए निम्न मुद्दों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है-

१ः बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम से कम करना।

२ः जैव विविधता बढ़ाते रहना।

३ः प्राकृतिक संसाधनों के सर्वोत्तम प्रबंधन के लिए आधुनिकतम विज्ञान के द्वारा उपाय खोजना।

 

 

सृजन खेती करना क्यों जरुरी है?

खेती की यह पद्धति पर्यावरण और मानव समाज को साथ-साथ में समृद्ध करती है और समानता, समृद्धि, स्वातंन्नय को प्रदान करती है।

इसके निम्न फायदे हैं-

१ः इससे हवा, पानी और भूमि रासायनिक प्रदूषण से मुक्त रहती हैं।

२ः इसमें कार्बन का उत्सर्जन कम और अवण ज्यादा होता है। ऐसा होने से पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ता।

३ः जैव विविधता बढ़ने से पर्यावरण का ताना-बाना मजबूत बनता है।

४ः इस पद्धति में लागत और मेहनत कम होती जाती है।

५ः खाद्य पदार्थ हानिकारक रसायनों से मुक्त होते हैं।

६ः पानी की बचत होती है।

७ः परिसर की सुंदरता बढ़ती है।

८ः इससे अव्यवस्था (एंट्रोपी) कम होती है।

९ः शाश्वत रोजगारों के लिए कच्चा माल तैयार होता है।

१०ः जैविक कचरे का योग्य प्रबंधन होता है।

सृजन खेती कौन कर सकता है?

पर्यावरण या खुद के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के प्रति संवेदनील कोई भी व्यक्ति इसे कर सकता है। शाश्वत खेती के इन तरीकों को किसान, नौकरीपे, व्यापारी, घरेलू महिला, विद्यार्थी, बुजुर्ग, निरक्षर कोई भी करके देख सकता है।

सृजन खेती कब ुरु करनी चाहिए?

जब पर्यावरण या स्वयं के अस्तित्व के लिए बढ़ते जा रहे खतरों को रोकने के लिए मन में कुछ करने की इच्छा पैदा होती है वही समय यह पद्धति अपनाने का सही समय है। सूचना तकनीक के इस दौर में आपमें कभी भी यह इच्छा पैदा हो सकती है। तो तैयार रहिए।

सृजन खेती कहाँ शुरु करनी चाहिए?

इसे ुरु करने के लिए बडे खेत या ढेर सारे उपकरणों की आवश्यकता नहीं है। आप अपने घर या कार्यस्थल के आसपास भी कुछ सरल प्रयोग करके देख सकते हैं। आसपास के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर आप इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। याद रखें पौधों के लिए सूर्यप्रकाश, उपजाऊ मिट्टी, पानी की सुनिश्चित उपलब्धता, सुरक्षा एवं देखभाल बहुत जरुरी है। अतः इनकी उपलब्धता के अनुसार ही प्रयोग और स्थान का चयन करें।

सृजन खेती कैसे ुरु करें?

इसके निम्न चरण हैं-

१ः खेती के शाश्वत तरीकों के बारे में जानकारी जमा करें।

२ः आपके आसपास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की सूची बनाएँ।

३ः आपके पास उपलब्ध स्थान एवं प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर प्रयोगों को चुनें।

४ः आप व्यक्तिगत समय कितना दे पाएँगे उस आधार पर कार्य की शुरुआत करें।

सृजन खेती के महत्वपूर्ण सूत्र क्या हैं?

इसके तीन महत्वपूर्ण सूत्र हैं-

१ः उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना ।

२ः पौधों के अंगों और उनके कार्यों का प्रबंधन करना। रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र, शरीरशास्त्र, जीवशास्त्र, भौमूतिकशास्त्र का स्वयं अभ्यास करना।

३ः अन्य प्रभावकारी घटकों का प्रबंधन करना।

प्राकृतिक संसाधन क्या होते हैं?

प्रकृति द्वारा मिलने वाली सुविधाओं और वस्तुओं को ही प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

१ः सूर्यप्रकाश और ऊश्मा।

२ः हवा में शामिल गैसें।

३ः पानी और उसके गुण।

४ः मिट्टी में शामिल रासायनिक तत्व।

५ः पेड़-पौधों से मिलने वाले पदार्थ।

६ः पशुओं से मिलने वाले पदार्थ।

७ः पक्षी और उनके द्वारा किए जाने वाले काम।

८ः सूक्ष्मजीवों से मिलने वाले रसायन।

९ः कीटों द्वारा किए जाने वाले रसायन।

१०ः मानव शरीर और मस्तिष्क।

११ः गुरुत्वाकर्षण।

१२ः चुंबकीय क्षेत्र।

१३ः अपना स्वयं का समय।

१४ः वातावरण की नमी।

. अमृत मिट्टी बनाने के तरीके और उसकी देखभाल

अमृत मिट्टी किसे कहते हैं?

इस मिट्टी को हमेशा उपजाऊ व जीवंत बनाए रखा जा सकता है इसलिए इसे अमृत मिट्टी कहते हैं। पौधों के विकास के लिए आवश्यक सभी रासायनिक, भौतिक और जैविक गुण इसमें संतुलित मात्रा में होते हैं जिसका नाम अमृत मिट्टी रखा गया है।

अमृत मिट्टी (शाश्वत उपजाऊ मिट्टी) कैसे तैयार होती है?

यह समझने के लिए हमें इस बात पर विचार करना होगा कि प्रकृति में सबसे अधिक उपजाऊ मिट्टी कहाँ है? वह कैसे तैयार होती है? प्रकृति सबसे ज्यादा उपजाऊ मिट्टी दुनिया भर के वर्षा वनों में तैयार करती है। इन जंगलों में पानी और हवा की वजह से पत्थरों और चट्टानों का बारीक मिट्टी में रुपांतरण होता रहता है। यह मिट्टी पेड़ों से झडे+ पत्तों पर जमा होती रहती है। जंगल के सभी जीव मिट्टी और पत्तों के इस मिश्रण पर अपने मल-मूत्र का त्याग करते रहते हैं। बरसात का पानी और पेड़ों की छाँव इस मिश्रण में नमी बनाए रखते हैं। यह प्रक्रिया सैकड़ों सालों तक चलती है तब कहीं जाकर शाश्वत उपजाऊ मिट्टी की एक इंच की परत १०० से ५०० सालों में तैयार हो पाती है। इसी विज्ञान का अवलोकन और अभ्यास करते हुए १४० दिन में इसी गुणवत्तायुक्त अमृत मिट्टी सृजन संस्कृति के आधार से मानव निर्माण कर सकता है।

अमृत मिट्टी क्या है?

मैंनें वर्षा वनों में सैकड़ों सालों में तैयार होने वाली शाश्वत उपजाऊ मिट्टी बनने की तकनीक को मानव की बुद्धि और मेहनत से १४० दिनों में बनाने का तरीका कई जगहों पर चलते प्रयोग और अभ्यास पर विकसित किया है, जिसमें प्रीति पाटिल के निष्कर्ष और स्वयं अनुभव आधार से १०० दिन की प्रक्रिया १४० दिन में परिवर्तित हुई है। इस मानव निर्मित मिट्टी के गुणों को देखते हुए डॉ. श्री ओ.पी. रुपेला जी (भूतपूर्व वरिष्ठ माइक्रो बायोलॉजिस्ट-प्ब्त्प्ै।ज्) ने अमृत मिट्टी का नाम दिया है। इसमें ये घटक पाए जाते हैं-

१ः सैकड़ों तरह के सूक्ष्मजीव (फफूंद और बैक्टेरिया) और कीट (केंचुए, चीटियाँ आदि)

२ः उपलब्ध अवस्था में खनिज पदार्थ।

३ः ह्यूमस।

४ः ह्यूमस, खनिज और सूक्ष्मजीवों से तैयार विविध रसायन जैसे- कल्चर, ह्यूमिक एसिड, एमिनो एसिड, हार्मोन्स।

अमृत मिट्टी तैयार करने की प्रक्रिया क्या है?

अमृत मिट्टी तैयार करने के मुख्य चार चरण हैं-

१ः अमृत जल तैयार करना।

२ः ढेर तैयार करना।

३ः ढेर का हरीतिकरण

४ः ढेर की देखभाल करना।

अमृत जल क्या है?

यह एक ऐसा घोल है जिसमें अवात जीवी सूक्ष्मजीवों की संख्या और विविधता बहुत अधिक होती है। इसमें मौजूद रासानिक तत्व मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और सूक्ष्मजीव मिट्टी के भौतिक और रासानिक गुणों को बढ़ाते हैं। इसमें मौजद सूक्ष्मजीव निम्न कार्य करते हैं-

१ः मिट्टी के पोषक तत्वों को पोषक जड़ों द्वारा उपयोग करने योग्य रुप में लाते हैं।

२ः जैविक पदार्थों से ह्यूमस तैयार करते हैं।

३ः मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं।

४ः उपयोगी रसायन तैयार करते हैं।

अमृत जल तैयार करने के लिए आवश्यक सामग्री क्या है?

करीब १११ लीटर अमृत जल तैयार करने के लिए निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है-

१ः एक लीटर भारतीय नस्ल की गाय का गोमूत्र।

२ः एक किलो ताजा गोबर।

३ः एक सौ दस (११०) लीटर पानी।

४ः काला या देशी गुड़ ५० ग्राम या १२ अति पके हुए केले या ६ अमरुद के फल या कटहल की १२ कलो या ५०० मिलीलीटर गन्ने का रस या काजू के १२ फल इसमें से जो भी उपलब्ध हो।

विशेष-

देशी गाय के गोमूत्र और गोबर की गुणवत्ता अच्छी होती है। अतः इसके उपयोग को प्राथमिकता दें। गोमूत्र जितना पुराना होगा उसकी गुणवत्ता उतनी अच्छी होगी। गोबर का ताजा होना बहुत जरुरी है क्योंकि ताजे गोबर में ही सूक्ष्मजीवों की संख्या ज्यादा होती है। काले गुड़ के उपयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि इसमें रासायन का इस्तेमाल नहीं होता। आवश्यकता के अनुसार अमृत जल तैयार करने के लिए सामग्री के अनुपात को स्थिर रखते हुए मात्रा परिवर्तित की जा सकती है।

अमृत जल तैयार करने की विधि क्या है?

सबसे पहले दस लीटर पानी में एक लीटर गोमूत्र मिलाएँ। अब इसमें एक किलो ताजे गोबर को अच्छी तरह घोलकर मिलाएं। इसके बाद ५० ग्राम गुड़ को पानी में तब तक पिघलाएं जब तक वह अच्छी तरह न घुल जाए। (गुड़ के एवज में १२ अतिपके हुए केले या ६ अमरुद के फल या कटहल की १२ कली या ५०० मिलीलीटर गन्ने या काजू के १२ फल का रस इसमें से जो भी उपलब्ध हो, उसका उपयोग करें) अब इस मिश्रण को ढँककर रख दें। दिन में ३ दफा इस मिश्रण को १२ बार घड़ी की दिशा में और १२ बार घड़ी की उलटी दिशा में घुमाएँ। घोल बनाने के ७२ घंटों बाद इसमें १०० लीटर पानी मिलाएं। करीब १११ लीटर के इस घोल को अमृत जल कहा जाता है।

विशेष-

१ः घोल में प्लास्टिक, पत्थर और धातु के टुकड़े न जाने दें।

२ः सूखे गुड़ के ढेलों को पीसकर मिलाने से वह जल्दी घुलता है। इसमें गुड़ के पर्याय के रुप में पके केले १२ या पके अमरुद के फल ६ या कटहल की १२ कलियाँ, काजू के १२ फल, गन्ने का ताजा आधा लीटर रस इस्तेमाल किया जा सकता है।

३ः इसे हमेशा ढँककर रखें।

 

जैविक कचरा (जैविक कचरा) क्या है?

अमृत मिट्टी तैयार करने के लिए लगने वाले जैविक पदार्थों जैसे-पेड़ों के पत्ते, फसलों का भूसा, घास, चारा आदि को जैवभार या जैविक कचरा कहा जाता है। यह जैविक प्रक्रियाओं से तैयार ऐसे पदार्थ हैं जिनका अपना भार होता है। इसलिए इन्हें यह नाम दिया गया है।

सब्जियों और फलों के छिलके, गोबर और बचा हुआ खाना भी जैविक कचरे के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राणियों के मृत शरीर और उनका मल भी जैविक कचर के ही प्रकार हैं।

 

ढेर क्या है?

वर्षा-वनों में उपजाऊ मिट्टी बनने के प्रकृति के तरीके की नकल करते हुए जैविक कचरे और बारीक मिट्टी की पतली-पतली परतें बनाकर उनके ढेर तैयार करने की प्रक्रिया को ढेर लगाना कहते हैं। इन ढेरों को अंग्रेजी में ढेर कहा जाता है। सुविधा के लिए इसका एक मानकीकृत (स्टैंडर्ड) आकार तय किया गया है। यह है-१० फुट लंबा, ३ फुट चौड़ा और एक फुट ऊँचा। इस आकार का एक ढेर होता है। एक ढेर से औसतन ४०० से ६०० लीटर अमृत मिट्टी तैयार होती है। औसत में इतना ज्यादा अंतर ढेर में नमी की मात्रा और अलग-अलग प्रकार के जैविक कचरे के ह्यूमस में बदलने की मात्रा कम-ज्यादा होने की वजह से होता है।

एक ढेर तैयार करने के लिए लगने वाली सामग्री क्या है?

स्पष्टीकरण-

एक ढेर में लगने वाली सामग्री उसके आकार, उसकी बनावट और उसमें इस्तेमाल किए गए जैविक कचरे के प्रकार पर निर्भर करती है। यह बात विविध स्थानों में प्रयोगों और अनुभवों से सामने आई है। एक मानक ढेर (१० फुट लंबा, ३ फुट चौड़ा और एक फुट ऊँचा) तैयार करने में लगने वाली सामग्री इस प्रकार है-

सामग्री मात्रा

अमृत जल करीब ५०० लीटर।

जैविक कचरा करीब १०० किलो।

बारीक मिट्टी करीब  २५ लीटर।

(१० प्रतिशत बारीक रेत के साथ)

विविध बीज ३०० ग्राम।

बारीक मिट्टी कहाँ मिलेगी?

घर के कचरे में निकलने वाली बारीक धूल सबसे अच्छी बारीक मिट्टी होती है। गांवों, खेतों में जमीन की ऊपरी आधा इंच की परत में यह पाई जाती है। इसे झाड़कर जमा किया जा सकता है। नदी-नालों के किनारों पर यह बारीक मिट्टी बड़ी मात्रा में जमा रहती है। मिट्टी यदि चिकनी हो तो उसमें करीब दस प्रतिशत बारीक रेत मिलाएँ।

ढेर कैसे तैयार किए जाते हैं?

ढेर बनाने के चार चरण हैं-

१ः करीब १००० लीटर अमृत जल तैयार करना।

२ः जैविक कचरे के ३-४ इंच के टुकड़े करके या भूसा बनाकर उन्हें अमृत जल में डुबोना।

३ः जैविक कचरे और मिट्टी की परतें लगाना।

४ः ढेर पर बीज लगाना और घास से ढँकना।

विशेष-

पहले ढेर के लिए डुबोया गया जैविक कचरा निकालने पर टाँके में करीब ५०० लीटर अमृत जल बच जाता है। इसका इस्तेमाल दूसरा ढेर बनाने के लिए किया जा सकता है। यदि जैविक कचरा डुबाने का क्रम निरंतर रखा जाए तो दूसरे ढेर से करीब ५०० लीटर अमृत जल बनाने की ही जरुरत पड़ती है।

प्रथम चरण : करीब १००० लीटर अमृत जल तैयार करना-

९० लीटर पानी में ९ किलो ताजा गोबर अच्छी तरह मिलाइए। अब इसमें लीटर गोमूत्र डालिए। गोमूत्र जितना पुराना हो उतना अच्छा। देशी गायों के गोमूत्र में रसायनों की मात्रा तुलनात्मक रुप से ज्यादा होती है। इसलिए इसका इस्तेमाल ज्यादा फायदेमंद होता है। सबसे अंत में इस मिश्रण में ४५० ग्राम गुड़ अच्छी तरह मिलाइए और इसे ढाँककर रख दीजिए। अब इस घोल को दिन में ३ बार १२ दफा उल्टा और १२ दफा सीधा अच्छी तरह हिलाइए और अपने साथ मन में संवाद करते चलें, इसका उपयोग कहाँ होगा, कैसे होगा और उससे क्या फलित होगा। तीन दिन बाद इस घोल को ९०० लीटर पानी में मिलाइए। करीब १००० लीटर अमृत जल तैयार हो जाएगा। इसे उसी दिन उपयोग करें।

दूसरा चरण : जैविक कचरे के छोटे-छोटे टुकड़े करके या भूसा बनाकर उन्हें अमृत जल में डुबोना-

अच्छी तरह सूखे करीब सौ किलो जैविक कचरे के बारीक-बारीक ३-४ इंच के टुकड़े कर लें। इन टुकड़ों को एक खाली टाँके में डालें। अब पहले से तैयार अमृत जल इस पर डालें। दो-तीन बार में पूरा अमृत जल इस पर पूर्ण रुप से दबा-दबाकर डाल दें। अब जैविक कचरे के टुकड़ों पर भारी पत्थर या लकड़ी के लठ्ठे रख दें ताकि इसके टुकड़े अमृत जल से बाहर न आएँ। अब जैविक कचरे को २४ घंटों के लिए अमृत जल में छोड़ दें।

तीसरा चरण : जैविक कचरे और मिट्टी की परतें लगाना-

१० फुट लंबाई, ३ फुट चौड़ाई और 1 फुट ऊँचाई के ढेर को मानक माना जाता है। जिस जगह पर ढेर लगाना हो वहाँ पहले १० फुट लंबाई और ३ फुट चौड़ाई की एक आयताकार आकृति खींच लेते हैं। अब अमृत जल में २४ घंटे भीगा हुआ जैविक कचरा निकालकर इस निर्धारित आकार के अंदर उसकी पतली परत बिछाते हैं। जैविक कचरे की एक परत में करीब पाँच किलो गीला जैविक कचरा लगता है। याद रखें अमृत जल में भीगने के बाद जैविक कचरे का वजन बढ़ जाता है। अब इस पर बारीक मिट्टी का छिड़काव करते हैं।

एक बार में करीब दो से तीन लीटर बारीक मिट्टी छिड़की जाती है। ( जैविक कचरे के आयतन का एक-चौथाई मिट्टी की मात्रा होनी चाहिए) जैविक कचरे की परत लगाने और उस पर बारीक मिट्टी के छिड़काव की इस प्रक्रिया को क्रमशः तब तक दोहराते हैं जब तक ढेर की ऊँचाई एक फुट न हो जाए। याद रखें जैविक कचरे की प्रत्येक पाँच परतों के बाद उस पर चलकर उसे अच्छी तरह दबाते जाना चाहिए। आमतौर पर जैविक कचरे की २५ और मिट्टी की २५ परतें एक-पर-एक बिछाकर उन्हें अच्छी तरह दबाने पर इनकी कुल ऊँचाई लगभग एक फुट हो जाती है। कई बार इन परतों की कुल संख्या ७० तक भी पहुँच जाती है।

चौथा चरण : ढेर का खाद में रुपांतरण करना और आच्छादन (मलचिंग) करना-

बने हुए ढेर को हर सात दिन में पलटी मारें और अमृत जल का छिड़काव करें। नमी बनाए रखें। पलटी मारकर आच्छादन बनाए रखें। इस तरह ३० दिन में खाद बन जाएगा।

पाँचवा चरण : ढेर का हरीतीकरण -

ढेर पर विविध प्रकार के ३०० ग्राम बीज लगाए जाते हैं। इन बीजों को बोने से पहले ८ घंटे अमृत जल में रखना चाहिए। ऐसा करने से बीज जल्दी अंकुरित होते हैं। अब सूखी घास को अमृत जल में डुबोकर उसकी २ इंच की परत बिछाकर ढेर को ढँक दिया जाता है। इस प्रकार ढेर को ढँकने की क्रिया को आच्छादन (मलचिंग) कहा जाता है। सूखी घास का इस्तेमाल कर किए गए आच्छादन को सूखा आच्छादन कहते हैं।

जीवंत आच्छादन के लिए निम्न बीज लगाए जाने चाहिए-

अनाज : मक्का, ज्वार, बाजरा, गेहूं, चावल आदि।

दालें : मूँग, उड़द, चना, तूर, मठ आदि।

तेल बीज : मूँगफल्ली, तिल, करडई, सरसों आदि।

मसाले : मिर्ची, मेथी, जीरा, सरसों आदि।

सब्जियां : पालक, टमाटर, बैंगन, ग्वारफल्ली, सेम आदि।

वेल वर्गीय : ककड़ी, काशीफल, लौकी, गिलकी, करेला आदि।

कंद : आलू, शकरकंद, हल्दी, अदरक आदि।

रेशेदार : भिंडी, कपास, अंबाड़ी।

फूलदार : गेंदा, मोगरा, बारामासी आदि।

औषधीय : तुलसी, शतावरी, अडुलसा आदि।

दीर्घजीवी : सुबबूल, नीम, मुनगा, करंज, ग्लीरिशिडिया आदि।

आयुर्वेद के छः रस के अनुसार ढेर पर निम्न प्रकार के बीज लगाने चाहिए -

छः रस के छह रस इस प्रकार हैं-

१ः मीठा सौंफ

२ः तीखा मिर्ची

३ः कड़वा मेथी, करेला

४ः खट्टा अंबाड़ी, टमाटर

५ः कसेला ग्वारफल्ली

६ः नमकीन पालक

बीज के अंकुरित होने के पश्चात्‌२१वें दिन २५ प्रतिशत छँटनी करें। तने को ऐसा ही रखें। इससे कोपल पत्तों में पाए जाने वाले तत्व-जिंक, फास्फेट, बोरान, मोलेब्डेनियम ढेर में उपलब्ध अवस्था में आ जाते हैं। दूसरे २१ दिन के बाद या ४२ दिन बाद बढ़े हुए पौधों को २५ प्रतिशत छाँट दें। इससे परिपक्व पत्तों में पाए जाने वाले तत्व-नाइट्रोजन, मैग्नीशियम और पोटेशियम ढेर में उपलब्ध अवस्था में आ जाते हैं। अंत में ६३वें दिन कुछ पौधों पर फूल खिलेंगे, इस अवस्था में सभी पौधों को जमीन से आधे इंच ऊपर से काटकर उसके ३-४ इंच के टुकड़े करके ढेर के ऊपर बिछा दें। ये कटे हुए पौधे ३-४ दिन में पीले हो जाएंगे। तब इस जैविक कचरे को ४-६ घंटे अमृत जल में डुबो दें। ये डूबा हुआ जैविक कचरा ढेर में मिला दें और ढेर को पलटी मार दें। अमृत जल का छिड़काव करें और ३० दिन तक रहने दें। इस अवधि में हर सात दिन ढेर को पलटी मारते रहें और नमी बनाए रखें।

इस तरह कुल १४० दिन में सबसे अच्छी उपजाऊ मिट्टी आपके खेत में तैयार हो जाएगी जिसे अमृत मिट्टी कहते हैं। यह विधि एक ही बार करनी है। पूरे खेत की मिट्टी अमृत मिट्टी बन जाएगी। उत्पादन लेने के बाद बाकी बचा जैवभार खेत में ही आच्छादन के रुप में डालते रहिये जिससे अमृत मिट्टी बढ़ती रहेगी।

 

 

 

ढेर का कैलेंडर कैसा होता है?

परिशिष्ट एक देखें।

ढेर पर बीज बोने से क्या लाभ मिलते हैं?

इसके निम्न फायदे होते हैं-

१ः इन बीजों से निकलने वाले पौधे ढेर को ढँककर रखते हैं जिससे ढेर में नमी बनी रहती है। जीवंत पौधों द्वारा ढेर को ढंकने के इस तरीके को जीवंत आच्छादन (लाइव मलचिंग) कहते हैं।

२ः अलग-अलग रसों के बीज लगाने से इनके पौधे विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व जमीन से जमा करते हैं।

३ः अलग-अलग उम्र के पौधों के पत्तों में भिन्न-भिन्न प्रकार के पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। इन पत्तों को ढेर में डालने से उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

४ः इनकी जड़ें मिट्टी भुरभुरी और मुलायम बनाती हैं।

५ः इनके पत्ते सूर्यप्रकाश से प्राप्त होने वाली ऊर्जा और हवा से मिलने वाले कार्बन को जमा करते हैं।

ढेर के अंदर हाथ डालने पर गर्मी क्यों महसूस होती है?

ढेर के अंदर करोड़ों सूक्ष्मजीव जैविक कचरा को अमृत मिट्टी में बदलने का काम कर रहे होते हैं। इन सूक्ष्मजीवों के शरीरों का कुल तापमान मिलकर यह गर्मी पैदा करता है। ढेर में जब सूक्ष्मजीव जोरशोर से काम करते हैं। तब यह गर्मी महसूस होती है। इसका तापमान ३० से धीरे-धीरे बढ़कर लगभग ५० डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता जा सकता है।

ढेर की देखभाल कैसे की जाती है?

इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

१ः ढेर में नमी बनाए रखने के लिए जरुरत के हिसाब से पानी देना चाहिए। बीजों से निकले पौधों के अंकुरों को यदि बढ़ने में अड़चन हो तो सूखी घास का आच्छादन निकाल देना चाहिए।

२ः अमृत मिट्टी बनाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए ७-७ दिन में ढेर को योग्य प्रमाण में अमृत जल से सींचना चाहिए।

३ः बीज से पौधे निकलने के २१ दिन बाद उनका ऊपरी २५ प्रतिशत भाग काटकर ढेर पर डालना चाहिए। ऐसा करने से इनमें मौजूद जिंक, फास्फेट, बोरान, मोलेब्डेनियम तत्व ढेर में उपलब्ध अवस्था में आ जाते हैं।

४ः पौधों के ४२ दिन के होने पर उनका ऊपरी २५ प्रतिशत भाग काटकर ढेर पर डालना चाहिए। ऐसा करने से ढेर में नाइट्रोजन, मैग्नीशियम और पोटेशियम तत्व उपलब्ध अवस्था में आ जाते हैं।

५ः पौधों के ६३ दिन के होने पर उनको जड़ों के पास से काटकर ढेर पर डाल देना चाहिए। ऐसा करने से इनमें मौजूद कैल्षियम, सिलिका, आयरन और मैग्नीज जैसे तत्व ढेर में उपलब्ध अवस्था में आ जाते हैं। इनकी जड़ों में उपयोगी जैविक रसायन होते हैं जिन्हें कल्चर कहा जाता है।

६ः ढेर पर से कटे जैवभार को अमृत जल में डुबाकर ढेर पर डालते समय पूरे ढेर को पलटी मारनी है। ऐसा करने से जड़ों के आसपास के सूक्ष्मजीव और कल्चर पूरे ढेर में फैल जाते हैं और उसे ३० दिन रखकर उसकी मात्रा को बढ़ाया जाता है। करीब ७५ दिन बाद उसे फावड़े से अलट-पलट कर अच्छी तरह मिलाना चाहिए। ऐसा करने से ढेर पर लगे पौधों से मिला हरा जैविक कचरा इसमें मिल जाता है। ऐसा करने से पोषक तत्वों की मात्रा और बढ़ जाती है। इसे पुनः ढेर के आकार में जमाकर सूखी घास से ढँक देना चाहिए।

७ः ढेर तैयार करने के १४० दिन पूरे होने पर ढेर को पलटी देकर इसका इस्तेमाल शुरु किया जाता है।

गन्ने के पत्तों और गेहूँ की डंठलों को अमृत मिट्टी में बदलने में ज्यादा समय क्यों लगता है?

गन्ने के पत्तों, गेहूँ की डंठलों जैसे जैविक कचरे को विघटित होने में ज्यादा समय लगता है। इसका कारण यह है कि इनके ऊपर एक मोम की परत होती है। यह परत अमृत जल को इसमें जाने से रोकती है। पर्याप्त नमी न मिल पाने की वजह से सूक्ष्मजीव इसे जल्दी विघटित नहीं कर पाते। इनसे जल्दी अमृत मिट्टी तैयार करने के लिए इनके ज्यादा से ज्यादा बारीक टुकड़े करने चाहिए और इन पर पानी डालकर इन्हें तब तक विघटित करना चाहिए जब तक ये काले न पड़ जाएं। इसके बाद इनका उपयोग अमृत मिट्टी बनाने में जैविक कचरे के तौर पर करना चाहिए। मजबूत रेशों की मात्रा ज्यादा होने से भी इस प्रकार के जैविक कचरे को अमृत मिट्टी में बदलने में ज्यादा समय लगता है। इनका कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात ज्यादा होने की वजह से भी इन्हें विघटित होने में ज्यादा समय लगता है। इस अनुपात के बारे में आगे बताया जाएगा।

ढेर में नमी की जाँच कैसे कर सकते हैं?

ढेर के करीब छह इंच अंदर से एक मुठठी जैविक कचरा निकालें। अब इसे मुठठी में जोर से दबाएं। यदि उसमें से एक-दो बूंद पानी टपकता है तो समझिए कि ढेर में नमी की मात्रा ठीक है। यदि जैविक कचरे से बूंद नहीं गिरती हैं तो इसका मतलब है कि जैविक कचरे में नमी कम है। जैविक कचरा हाथ में लेते ही यदि आपके हाथ चिपचिपे या गीले हो जाते हैं तो इसके मायने हैं कि ढेर में नमी जरुरत से ज्यादा है। ज्यादा नमी होने पर सूक्ष्मजीवों को जरुरत के मुताबिक हवा नहीं मिल पाती और जैविक कचरा विघटित होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इस तरीके को ढेर के अलग-अलग हिस्सों पर दोहराएं।

 

 

ढेर में नमी बनाए रखने के क्या उपाय हैं?

गन्ने के पत्ते जैसे जैविक कचरे का इस्तेमाल करने पर कई बार ढेर को दिया गया पानी इस पर से बह जाता है जिसकी वजह से ढेर के अंदर पर्याप्त नमी नहीं रहती। इस समस्या से निपटने के लिए ढेर के ऊपर एक-एक फुट के अंतर पर ६ इंच गहरे और २ इंच चौड़े गड्ढे कर देना चाहिए। इन गड्ढों में पानी देने से ढेर के अंदर नमी बनाए रखी जा सकती है।

ढेर कड़ा होने पर क्या करना चाहिए?

ढेर कड़ी होने पर फावड़े से उसे पलटकर अच्छी तरह मिलाना चाहिए। उसमें योग्य प्रमाण में अमृत जल मिलाना चाहिए और उसे पुनः ढेर के आकार में लगाकर सूखी घास से ढँक देना चाहिए।

१४० दिन में अमृत मिट्टी न बन पाने की क्या-क्या वजहें हो सकती हैं?

इसकी कई वजहें हो सकती हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

१ः यदि जैविक कचरे के बारिक टुकड़े नहीं किए गए ।

२ः ढेर में पर्याप्त नमी न बनाए रखने के कारण।

३ः ढेर में जैविक कचरे की परतें मोटी और कम लगाने से।

४ः ढेर को मलचिंग न करने से सूक्ष्मजीव मर जाते हैं।

५ः ढेर में हवा का आना-जाना रुकने से ऑक्सीजन की उपस्थिति में जिंदा रहने वाले सूक्ष्मजीव मर जाते हैं।

६ः बहुत ज्यादा पानी देने पर ढेर अंदर से चिपचिपी हो जाती है। ऐसे में सूक्ष्मजीव काम नहीं कर पाते।

७ः ढेर में नाइट्रोजन की कमी से भी विघटन की प्रक्रिया धीमी होती है। इसलिए अमृत जल देना जरुरी है।

ढेर तैयार करने का वार्षिक कैलेंडर कैसा है?

परिशिष्ट-दो देखें।

अमृत मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने के लिए क्या-क्या करना चाहिए?

१ः इस मिट्टी में पैदा होने वाले खाद्य पदाथोर्ं को निकालने के बाद बचा हुआ सारा जैविक कचरा इसी पर आच्छादन के रुप में इस्तेमाल करना चाहिए।

२ः प्रत्येक तीन माह बाद एक वर्गफुट में ३० ग्राम की दर से इसमें जैविक कचरे की राख मिलाई जानी चाहिए।

३ः इसे हमेशा जीवंत आच्छादन से ढँककर रखना चाहिए। यदि पानी की कमी हो तो अमृत मिट्टी को छांव में ढेर बनाकर इसे सूखी घास, पॉलीथिन पेपर या पत्थरों से ढँक देना चाहिए।

४ः अमृत मिट्टी को निम्नानुसार अमृत जल देना चाहिए-

पहले साल- ७ दिन में एक बार

दूसरे साल- १५ दिन में एक बार

तीसरे साल- एक माह में एक बार

चौथे साल- तीन माह में एक बार

पाँचवे साल- छह माह में एक बार

इसके बाद अमृत जल देने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

पौधों के विकास के लिए प्रति वर्गफुट कितनी अमृत मिट्टी लगती है?

इसके लिए प्रति वर्गफुट कम से कम ४ लीटर अमृत मिट्टी होनी जरुरी है।

कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात क्या है?

प्रत्येक जैविक पदार्थ में कार्बन और नाइट्रोजन तत्व मौजूद होते हैं। इनकी मात्रा के अनुपात को कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात कहा जाता है। कोई भी जैविक पदार्थ अमृत मिट्टी बनने में कितना समय लेगा यह उसके कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात पर भी निर्भर करता है। सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और नाइट्रोजन से बने पदार्थों से वे प्रोटीन हासिल करते हैं। यह निर्धारित किया गया है कि ३०ः१ (३० गुना कार्बन की तुलना में एक गुना नाइट्रोजन) वाले जैविक कचरे को सूक्ष्मजीव तेजी से अमृत मिट्टी में बदलते हैं। लेकिन आमतौर पर जिस प्रकार के जैविक कचरे इस्तेमाल किए जाते हैं उनमें यह अनुपात निर्धारित से ज्यादा होता है। इसलिए इनसे बने ढेर अंदर से ठंडे रहते हैं और अमृत मिट्टी में बदलने में लंबा समय लेते हैं। यदि जैविक कचरे का यह अनुपात निर्धारित से कम होता है तो उसके ढेर से अमोनिया गैस (पेशाब) जैसी बदबू आती है। जैविक कचरे के इस अनुपात को निर्धारित अनुपात के आसपास लाने के लिए सूखे और हरे जैविक कचरे को सुखाकर करीब आधा-आधा मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा करने से अमृत मिट्टी बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

पौधों के विकास के लिए कितने पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है? पौधे इन्हें कहां से लेते हैं?

पौधों को ३० से अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनमें से ४ तत्व हवा से लेते हैं।

पौधे हवा और मिट्टी दोनों से नाइट्रोजन लेते हैं।

हाइड्रोजन, ऑक्सीजन पौधे पानी से लेते हैं।

कार्बन डाइ ऑक्साइड से कार्बन लेते हैं।

अमृत मिट्टी में रासायनिक खनिजों और जैविक खाद का अनुपात क्या होता है?

व्यवस्थित प्रक्रिया कर तैयार की गई अमृत मिट्टी के आयतन में आधा भाग रासायनिक खनिज और आधा भाग काला पूर्ण रुप से खाद में परिवर्तित जैविक पदार्थ से तैयार ह्यूमस होना चाहिए।

ह्यूमस किसे कहते हैं?

सूक्ष्मजीवों का मृत शरीर और उनके जीवंत सूक्ष्म जीवों द्वारा जैविक पदार्थ यानि जैविक कचरे का विघटन करने पर तैयार होने वाला हल्का, काला, नम और बारीक रेशों वाला सुगंधित पदार्थ ह्यूमस कहलाता है। जिस जैविक कचरे से ह्यूमस तैयार होने में जितना समय लगता है लगभग उतने ही समय तक यह मिट्टी को फायदा पहुँचता है। जिस जैविक कचरे से ह्यूमस तैयार होने में ज्यादा समय लगता है उसकी अमृत मिट्टी भी उतनी ही ज्यादा दिनों तक उपजाऊ बनी रहती है। इसे एक लीटर की बोतल में भरने पर इसका वजन लगभग ४०० ग्राम होता है।

अमृत मिट्टी की पहचान कैसे करेंगे?

अमृत मिट्टी हल्की, भुरभुरी, दानेदार और काली होती है। इनमें हमेशा पहली बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली महक आती रहती है। इसे मुठठी में लेकर गोला बनाने पर इसका गोला बनता है लेकिन हाथों में मिट्टी के दाग नहीं पढ़ते। अमृत मिट्टी तैयार हो जाने पर ढेर का आकार लगभग तीन गुना कम हो जाता है। इस मिट्टी को यदि पानी की एक लीटर की बोतल में भर कर तौला जाए तो उसका वजन लगभग ४०० ग्राम आना चाहिए। लेकिन किए गए प्रयोगों में यह अलग-अलग जैविक कचरे और मिट्टी के अनुपातों की वजह से ५०० से १२०० ग्राम तक आया है।

इन प्रयोगों से लगता है कि ह्यूमस ज्यादा बनने पर अमृत मिट्टी का वजन कम होता है और ह्यूमस कम बनने पर अमृत मिट्टी का वजन ज्यादा होता है।

मिट्टी में ह्यूमस और खनिजों की मात्रा का पता कैसे लगाया जा सकता है?

एक मुठठी मिट्टी को पानी से भरे एक काँच के गिलास में डालकर पाँच मिनिट छोड़ दीजिए। पाँच मिनिट बाद पानी की तली में बैठे पदार्थ रासानिक खनिज होंगे और पानी के ऊपर तैरने वाला पदार्थ ह्यूमस होगा।

जैविक पदार्थों की राख और ह्यूमस अमृत मिट्टी को किस तरह प्रभावित करते हैं।

मिट्टी अम्लीय है, क्षारीय है या उदासीन है इस बात को जांचने के लिए पी.एच. पैमाने का इस्तेमाल किया जाता है। अमृत मिट्टी लगभग उदासीन होती है। इसका पी.एच. .५ से ७.५ के बीच होता है। अमृत मिट्टी का पी.एच. इस सीमा से बाहर होने पर राख और ह्यूमस का इस्तेमाल कर इसे उदासीनता की सीमा में लाया जाता है। जैविक पदार्थों की राख डालने से अमृत मिट्टी का पी.एच. बढ़ता है। ह्यूमस डालने से अमृत मिट्टी का पी.एच. कम होता है।

.पौधों के अंगों और उनके कार्यों का प्रबंधन

पौधे क्या हैं?

पौधे सजीव हैं। वे भी साँस लेते हैं, भोजन करते हैं। उनका भी जन्म होता है, शारीरिक विकास होता है और मृत्यु होती है। प्राणियों की तरह ही पौधों में भी खास काम के लिए खास अंग होते हैं। अतः उनके महत्वपूर्ण अंगों के बारे में जानकारी जमाकर उत्पाादन बढ़ाया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पौधे चल फिर नहीं सकते लेकिन वे एक ही जगह पर खड़े रहकर ही सूर्यप्रकाश, हवा, मिट्टी और पानी की मदद से खुद का भोजन खुद ही बना लेते हैं। इतना ही नहीं, उनके द्वारा जमा किया गया भोजन बहुत सारे मानव, पशु-पक्षी और सूक्ष्मजीव (बेक्टेरिया, फफूंद) भी इस्तेमाल करते हैं।

पौधों के मुख्य अंग कौन-कौन से हैं?

पौधों के मुख्य अंग हैं-

१ः बीज

२ः जडें

३ः तना

४ः डालियाँ

५ः पत्ते

६ः फूल

७ः फल

बीज क्या हैं?

यह एक जादूई चीज है। एक नन्हे से बीज में बड़ा पेड़ बनने की और अपनी तरह के करोड़ों बीज बनाने की आनुवंशिक जानकारी और क्षमता होती है। यदि इसे अंकुरित होने और पनपने के लिए सही परिस्थितियाँ मिल

जाएँ तो यह चमत्कारिक रुप से पेड़ या पौधे का रुप धारण कर लेता है। इसे अंकुरित होने के लिए नमी और तापमान में तफावत होना जरुरी है। इससे निकलने वाले कोमल पत्तों को पनपने के लिए चाहिए सूर्यप्रकाश। इससे निकलने वाली नाजुक जड़ों को चाहिए भुरभुरी नमीयुक्त मिट्टी।

बीज अन्न का एक छोटा भंडार होता है। यह भंडार पौधों की आरंभिक जड़ों और अंकुर के विकास में काम आता है। ये कोपलें सूर्यप्रकाश और हवा की मदद से अपना भोजन खुद बनाने लगती हैं। जड़ें मिट्टी से आवश्यक तत्व खींचने में मदद करती हैं। जब ये आरंभिक पत्ते और जड़ें काम करना आरंभ कर देते हैं तो पौधा आत्मनिर्भर बन जाता है।

बीज दो प्रकार के होते हैं-

एक दलीय जैसे- गेहूँ, मक्का, चावल।

द्विदलीय जैसे- मूँग, उड़द, चना।

 

देशी बीजों की क्या खासियत है?

इन्हें इस्तेमाल करने वालों का अनुभव है कि ये स्थानीय मौसम के अनुरुप ढले होते हैं। ये कम या ज्यादा बारिश होने पर भी अंकुरित हो जाते हैं। इनका उत्पादन संकरित बीजों की तुलना में कम होने के बावजूद ये विपरीत परिस्थितियों में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन देकर खाद्य सुरक्षा प्रदान करते हैं। इन पर रोगों और कीड़ों का असर भी कम दिखाई देता है। देशी बीजों की सब्जियों और अनाजों का स्वाद भी खास होता है और ये ज्यादा पोषक होते हैं। इन्हें वृद्धि के लिए बाजारु रसायनों की आवश्यकता नहीं पड़ती। ये स्थानीय उर्वरा मिटटी में ही अच्छी तरह विकसित होते हैं। इन्हें भविष्य के लिए जमा करके रखने और जमा बीजों का उपयोग करने से बाजार से बीज खरीदने की जरुरत नहीं रह जाती। किसानों का अनुभव कहता है कि बाजार के हाइब्रीड बीजों को बार-बार बोने से उनका उत्पादन गिरता जाता है। लेकिन सही विधि से देशी बीज जमा करने और इन्हें बार-बार लगाने पर इनका उत्पादन बहुत धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। लेकिन ज्यादा उत्पादन लेने की दौड़ में अब इन बीजों का इस्तेमाल और अस्तित्व लगभग खत्म हो गया है। जहाँ देशी बीज उपलब्ध हैं वहाँ उनका उपयोग कर उन्हें बचाए रखने की जरुरत है, नहीं तो हजारों सालों में तैयार हुआ यह अनुवंशिकी का खजाना गायब हो जाएगा। बीजों को खराब होने से बचाने के लिए राख लगाकर या नीम के पत्तों के साथ रखा जाता है। अलग-अलग प्रकार के खास बीजों को मिलाकर रखने से भी इनमें कीट लगने की आशंका कम हो जाती है।

जड़ें कितने प्रकार की होती हैं? इनके कार्य क्या हैं?

पौधों में मुख्यतः दो प्रकार की जडें+ होती हैं। पहली पोषक जडें+ (फीडर रुट) और दूसरी आधार जडें+ (एंकर रुट)। पोषक जडें+ मिट्टी से पोषक तत्व और पानी खींचती हैं। आधार जडें+ जमीन में गहराई तक जाकर पेड़ों को मजबूत आधार प्रदान करती हैं। जरुरत पड़ने पर यह जमीन के नीचे का पानी और पोषक तत्व खींचकर तने और डालियों के माध्यम से पत्तों तक पहुँचाती हैं। आधार जडें+ मोटी और मजबूत होती हैं, जबकि पोषक जडें+ तुलनात्मक रुप से पतली और नाजुक होती हैं। पोषक जडें+ मिट्टी में गहरे जाने के बजाय उपजाऊ मिट्टी में

९ इंच तक चारों ओर फैलना पसंद करती हैं।

पत्ते कितने प्रकार के होते हैं और इनके कार्य क्या हैं?

पत्ते मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं।

१ः कोपल-कोमल पत्ते

२ः परिपक्व पत्ते

३ः पीले पत्ते

इनका मुख्य कार्य पेड़-पौधों के लिए भोजन बनाना होता है। इनमें क्लोरोफिल नाम का हरे रंग का एक चमत्कारी पदार्थ होता है। इसी की वजह से पत्तियाँ हरी दिखाई देती हैं। यह पदार्थ सूर्यप्रकाश, हवा (कार्बनडाइआक्साइड) और पानी का इस्तेमाल कर भोजन बनाता है। पौधों में बना खाना डालियों और तने में जमा होता जाता है। कई बीजों के अंकुरित होने पर उनमें आरंभ में दो पत्ते आते हैं। ये दोनों पत्ते जल्द ही गल जाते हैं। इनके बाद कुछ कोमल पत्ते आते हैं। ये पत्ते आगे चलकर परिपक्व हो जाते हैं। परिपक्व होने पर ही पत्ते सूर्यप्रकाश को पूर्ण रुप से भोजन में बदल पाते हैं।

पौधों के आरंंिभक पत्तों में हर नया पत्ता उसके पहले वाले पत्ते से आकार में बड़ा आता है। यह पौधे के योग्य विकास का लक्षण है। प्रत्येक पौधे के पत्तों की निर्धारित उम्र होती है। आयु पूरी होने पर ये पीले पड़कर गल जाते हैं और बाद में सूख कर विघटित होने लगते हैं। कोपल और पीले पत्ते सूर्यप्रकाश को पूरी तरह नहीं पकड़ पाते। इसलिए सूर्यप्रकाश को पकड़ने के लिए परिपक्व पत्तों की ही आवश्यकता होती है।

क्या अलग-अलग उम्र के पत्तों में अलग-अलग पोषक तत्व होते हैं?

हाँ। कोमल पत्तों में जिंक, फॉस्फेट, मोलेब्डेनियम और बोरान तत्व होते हैं। ये तत्व पत्तों की कोशिकाएं बनाने में मदद करते हैं। परिपक्व या प्रौढ़ पत्तों में नाइट्रोजन, पोटेशियम, फास्फोरस, मैग्नेशियम सल्फर, जिंक, कॉपर, आयरन और मैग्नीज तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व पत्तों का आकार बढ़ाने और क्लोरोफिल बनाने में मदद करते हैं। पत्तियाँ सूखने से पहले नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, मैग्नेशियम, सल्फर, जिंक और कॉपर तत्व पौधे को लौटा देती हैं। इसलिए सूखी पत्त्यिों में सिर्फ कैल्षियम, सिलिका, बोरान, आयरन और मैग्नीज तत्व ही पाए जाते हैं।

पेड़-पौधों के शारीरिक विकास की कितनी अवस्थाएँ होती हैं? इनकी पहचान कैसे होती है?

किसी भी अल्पजीवी और मध्यम जीवी पेड़-पौधे के शारीरिक विकास की ५ अवस्थाएँ होती हैं। उसकी औसत आयु में ५ का भाग देने पर जो समान पाँच भाग मिलते हैं वह प्रत्येक अवस्था की लगभग अवधि को प्रदर्षित करते हैं। उदाहरण के लिए मूंग की फसल १०० दिनों में पककर तैयार होती है तो इसे पांच से भाग देने पर २० अंक प्राप्त होता है। यानि इसकी प्रत्येक अवस्था २० दिनों की होगी।

प्रत्येक अवस्था की पहचान के लिए उस दौरान होने वाले परिवर्तन इस प्रकार हैं-

बाल अवस्था- इस दौरान पौधा अपनी पोषक जड़ों और कुछ कोपलों से परिपक्व पतों का विकास करता है। इस अवस्था में प्रत्येक नया पत्ता पुराने पत्ते से बड़ा आता है।

किशोर अवस्था- इस दौरान पौधे में शाखाओं और डालियों का विकास तेजी से होता है। परिपक्व पत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ती है। तने का आकार भी बढ़ता जाता है।

युवा अवस्था- इस दौरान पौधे की कैनोपी यानि हरी छतरी और पोशक जड़ों का तेजी से विकास होता है। साथ ही इसके शरीर में कुछ खास तरह के रसायन यानि हार्मोन तैयार होते हैं।

प्रौढ़ अवस्था- इसका मुख्य लक्षण है पौधे में फूल आना और फलों का विकास होना।

वृद्ध अवस्था- इस अवस्था में फल परिपक्व होते हैं। पौधे के पत्ते और डालियाँ मुरझाकर सूखने लगते हैं। अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर भी आयु पूर्ण होने की वजह से वह सूखकर मर जाता है।

हरी छतरी (कैनोपी) क्या है?

इसे हिंदी में पौधे की हरी छतरी या घटा कहा जाता है। पौधे की सारी पत्तियों को मिलाकर जो छतरी तैयार होती है वही उसकी कैनोपी है। एक सरल नियम के अनुसार पौधे की छतरी यानि कैनोपी की छाँव दिन के १२ बजे जितनी जगह पर पड़ती है उतनी ही जगह में उस पौधे की पोषक जडें+ भी फैलती हैं। हरी छतरी फैलने से पौधा ज्यादा सूर्यप्रकाश पकड़ता है और पोषक जड़ों का जाल फैलने से ज्यादा क्षेत्र के पोषक तत्व जमा करता है।

पर्णांक (लीफ इंडेक्स) क्या होता है?

खास प्रजाति के किसी पौधे को एक वर्गफुट में दिनभर में गिरने वाला पूरा सूर्य प्रकाश पकड़ने के लिए जितने गुना ज्यादा पत्तों के क्षेत्रफल की जरुरत होती है उसे उस पौधे का पर्णांक लीफ इंडेक्स कहते हैं। उदाहरण के लिए केले के पौधे का लीफ इंडेक्स ५ है। इसका अर्थ है कि उसे एक वर्गफुट में दिनभर पड़ने वाला सूर्यप्रकाश पूरा ग्रहण करने के लिए ५ वर्गफुट के परिपक्व पत्तों की आवश्यकता पड़ेगी।

केले का एक पूर्ण विकसित पौधा २५ वर्गफुट में फैलता है। इस इलाके में पड़ने वाला पूरा सूर्यप्रकाश ग्रहण करने के लिए उसे लीफ इंडेक्स के अनुसार इस क्षेत्र से पांच गुना ज्यादा यानि १२५ वर्गफुट क्षेत्रफल वाले पत्तों की आवश्यकता होगी। अर्थात्‌ यदि केले के पौधे के सभी परिपक्व पत्तों का कुल क्षेत्रफल १२५ होगा तो वह दिनभर का पूरा सूर्यप्रकाश ग्रहण कर सकेंगे।

एक पूर्ण विकसित पौधे को लगने वाली जगह (वर्गफुट) में लीफ इंडेक्स का गुणा करने पर पता चलता है कि उसके सभी पत्तों का कुल क्षेत्रफल कितना होने पर वह दिनभर का पूरा सूर्यप्रकाश जमा कर पाएगा। आमतौर पर पौधों का लीफ इंडेक्स ३ से १० के बीच होता है।

तना क्या काम करता है?

यह पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को जमा करने का काम करता है। यह जड़ों द्वारा मिट्टी से लाए गए पोषक तत्वों को पत्तियों और फलों तक पहुँचाने के लिए माध्यम का काम भी करता है। यह डालियों, फलों-फूलों और पत्तियों को आधार भी देता है। इसमें हर साल एक नया घेरा तैयार होता है जिससे पेड़ों की उम्र पता की जा सकती है। अलग-अलग प्रजाति के पेड़ों के तनों की छालों की छाप भी अलग-अलग होती है। इससे उस पेड़ की सही पहचान कर उसके बारे में सटीक वैज्ञानिक जानकारी हासिल की जा सकती है।

फूलों का मुख्य कार्य क्या है?

ये पौधों के प्रजनन अंग होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-नर और मादा। ज्यादातर प्रजातियों में एक ही पौधे पर नर और मादा फूल खिलते हैं। जैसे-लौकी। कुछ प्रजातियों में नर और मादा फूल अलग-अलग पेड़ों पर खिलते हैं, जैसे-नारियल। तितलियाँ, भँवरे, पक्षी, मधुमख्ख्यिाँ और अन्य प्राणी नर पराग कणों को मादा फूलों के पराग कणों तक पहुँचाने में मदद करते हैं। इस क्रिया को परागण कहते हैं। यदि मानव अपनी समझ से इस क्रिया को करता है तो उसे कृत्रिम परागण कहते हैं। मादा फूलों में नर पराग कण आने के बाद फल बनने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है।

 

फल क्या काम करते हैं?

ये अपनी प्रजाति को बचाए रखने के लिए बीजों का भंडारण करते हैं। पक्षी-प्राणी इनके गूदे को खाते हैं और बीजों को फैलाते हैं। जिन बीजों को अनुकूल परिस्थितियाँ मिल जाती हैं, वे अंकुरित होकर पनपते हैं और पौधे बन जाते हैं।

नोड किसे कहते हैं?

जिन पौधों और वेलों में एक के बाद एक पत्ते आते हैं उनमें दो सबसे नजदीक के पत्तों के बीच की डाल को नोड कहते हैं। जैसे लौकी और ककड़ी। जिन पौधों में पत्तों के गुच्छे आते हैं उनमें दो नजदीक के गुच्छों के बीच की डाल को नोड कहते हैं। जैसे आम।

हरी छतरी (कैनोपी) और पोषक जड़ों में क्या संबंध है?

जैसे-जैसे पौधे की कैनोपी यानि हरी छतरी का विस्तार होता जाता है, वैसे-वैसे मिट्टी में पोषक जड़ों का जाल फैलता जाता है। यह एक साधारण नियम है। इन दोनों में सीधा संबंध है। जब किसी कारण से जड़ों का विकास रुक जाता है तो कैनोपी का विकास भी थम जाता है। यदि पौधे को पर्याप्त सूर्यप्रकाश नहीं मिलता है तो उसकी हरी छतरी का घेरा नहीं बढ़ता है और इसी वजह से उसकी छाया में जमीन के नीचे बढ़ने वाला पोषक जड़ों का जाल भी नहीं बढ़ पाता है।

हरी छतरी और पोषक जड़ों के जाल का संतुलित विकास कैसे किया जा सकता है?

हरी छतरी के विकास के लिए पौधे की छँटनी की जाती है। पोषक जड़ों के विकास के लिए जड़ों का उपचार यानि रुट ट्रीटमेंट किया जाता है। छँटनी और जडों का उपचार करके पौधों की जड़ों और छतरी का संतुलित विकास किया जा सकता है।

छँटनी (प्रूनिंग) क्या है? इसके फायदे क्या हैं?

पेड़ों के अंगों को समझदारी से काटने की क्रिया को छँटनी कहते हैं। इसे अंग्रेजी में प्रूनिंग कहा जाता है। वनस्पतियों में एक विशेष गुण होता है। उनकी डालियाँ और पत्ते काटने पर नए आ जाते हैं। इस गुण का इस्तेमाल पौधों को सुंदर, सुविधाजनक आकार देने और ज्यादा उत्पादन लेने के लिए किया जाता है। छँटनी से कैनोपी बढ़ती है और इससे पौधों को ज्यादा सूर्यप्रकाश पकड़ने में मदद मिलती है। याद रखें जितनी ज्यादा नई डालियाँ आएंगी फलों की संख्या बढ़ने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाएगी।

छँटनी संबंधी सावधानियां क्या हैं?

१ः फल निकाल लेने के बाद ही छँटनी करनी चाहिए। फल लगने के मौसम में उसके ठीक पहले छटाई करने से उत्पादन कम हो सकता है।

२ः छँटनी के लिए सिकेटीयर या खास तरह की कैंचियों का इस्तेमाल करने से पौधों को नुकसान नहीं होता।

३ः डालियाँ काटने के तुरंत बाद कटे हुए हिस्से पर गोबर और राख का लेप लगाना चाहिए। इससे डाल की नमी बनी रहती है और रोग लगने की आशंका कम हो जाती है।

४ः छँटनी सुबह या शाम को करने से सूर्यप्रकाश का झटका कम लगता है।

५ः छँटनी के दौरान डालियां और पत्ते पेड़ के पास ही आच्छादन के रुप में डालने चाहिए।

 

फलदार पेड़ों की छँटनी का तरीका क्या है?

फलदार पेड़ों के लिए छँटनी का तरीका-

१ः आपको पेड़ को कुदरती आकार देना हैं, उसे ध्यान में रखकर डालियों की छँटनी करनी चाहिए।

२ः सूखी, टूटी हुई, जमीन की ओर बढ़ने वाली और रोगग्रस्त डालियों को छाँट देना चाहिए।

३ः जहाँ से ५-७ डालियाँ एक साथ निकली हों वहां छँटनी कर डालियों की संख्या ३-४ कर देनी चाहिए। मजबूत डालियों को छोड़ देना चाहिए और कमजोर शाखाएँ छाँट देनी चाहिए।

४ः जिन डालियों की लंबाई बढ़ रही हो लेकिन उनमें नई शाखाएँ नहीं आ रही हों, उन्हें काटकर छोटा कर देना चाहिए, ताकि उनमें नई डालियाँ फूट सकें। आमतौर पर फलदार पेड़ों में दस नोड से ज्यादा लंबी डाली को दसवें नोड पर काट दिया जाता है। इसका एक सीधा सरल नियम यह भी है कि लंबी डाली जिस नोड से भूरे रंग से बदल कर हरे रंग की होने लगती है, वहां से उसे काट देना चाहिए।

फलदार सब्जियों की छँटनी कैसे की जाती है?

फलदार सब्जियों के लिए छँटनी का तरीका-

टमाटर, मिर्ची, बैंगन में फूलों के गुच्छे के ऊपर की कोपल छाँटने से फलों का आकार और संख्या बढ़ती है।

 

बेलवर्गीय सब्जियों की छँटनी किस तरह की जाती है?

बेलवर्गीय सब्जियों के लिए छँटनी का तरीका-

बेलवर्गीय सब्जियों जैसे कद्दू, ककड़ी, लौकी के बीज अंकुरित होने के बाद पहले २१ दिन की इनकी बाल अवस्था में एक गुच्छा पत्तों का बनता है और इसमें ७ पत्ते आते हैं। इसके बाद इनकी किशोर अवस्था आरंभ होती है। इसमें हर दिन हर शाखा पर एक नया पत्ता आता है। इसमें १३ नोड पर १३ पत्ते आने के बाद इसके आठवें नोड तक तने की मोटाई इतनी बढ़ चुकी होती है कि उसके पास से नई शाखाएँ निकल सकती हैं। लेकिन इसके लिए वेल के सिरे से पाँच नोड गिनकर उन्हें काटना होता है।

यदि आप वेल को किसी मंडप पर चढ़ाना चाहते हैं तो उसकी ऊँचाई तक वेल को सीधी बढ़ने दें। ऊपर पहुँचने से पहले उसकी शाखाएँ काटते रहें। ऊपर पहुँचने पर वहां से आगे १३ नोड बढ़ने पर उसके सिरे से ५ नोड गिनकर उन्हें काट दें। बचे हुए आठवें नोड के पास से नई शाखा निकलेगी। नई शाखाओं में १३ नोड आने पर इनके सिरों से भी पाँच नोड गिनकर काट दें। ऐसा करने से नई शाखाएँ जल्दी आती हैं। और नई शाखाओं पर फल लगने की संभावना ज्यादा होती है। ऐसा करने से वेल के खाद्य भंडार से पत्तों और नोड के बजाय फल ज्यादा बनने लगते हैं। ६३ दिनों बाद वेल की प्रौढ़ अवस्था शुरु हो जाती है। यदि छँटनी निरंतर की गई हो तो इसमें कई नई शाखाएँ आ चुकी होती हैं। इनमें फूल और फल आने की संभावना ज्यादा होती है।

सिरातोड़ (पिंचिंग) कैसे की जाती है?

फलदार पेड़ों और सब्जियों में फूल आने के कम से कम एक माह पूर्व डालियों के सिरे ऊँगलियों की चिमटी से तोड़ने को सिरातोड़ यानि पिंचिंग कहते हैं। ऐसा करने से डालियों का विकास रुक जाता है और फलों का विकास तेजी से शुरु हो जाता है।

फलदार पेड़ों का जड़ों का उपचार (रुट ट्रीटमेंट) क्यों करना चाहिए?

ऐसे पेड़ जिनमें कई सालों से फल नहीं लगते हैं, फल जल्दी गिर जाते हैं, या शाखाओं का विकास न हो रहा हो, उनकी जड़ों का उपचार करके उनसे बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। इसे अंग्रेजी में रुट ट्रीटमेंट कहते हैं। अक्सर मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी, दीवार-पत्थर या अन्य कारणों से पेड़ की पोषक जड़ों का विकास रुक जाता है। यदि ऐसे पेड़ों की पोषक जड़ों के आसपास अमृत मिट्टी डाल दी जाए और बीमार पोषक जड़ों को काट दिया जाए तो नई पोषक जडें+ पनप सकती हैं। ऐसा करने से पेड़ बेहतर उत्पादन दे सकता है।

फलदार पेड़ों की जड़ों का उपचार कैसे करना चाहिए?

इसे चार चरणों में किया जाता है।

फलदार पेड़ों की जड़ों का उपचार करने की प्रक्रिया-

१ः पेड़ के घेरे यानि हरी छतरी (कैनोपी) के नीचे की जमीन को चार समान भागों में बँाटिए।

२ः इनमें से एक भाग चुनिए।

३ः इस भाग में पेड़ की डालियों के सिरों के नीचे की जमीन को एक फुट गहरा खोदिए। यदि यहाँ पोषक जड़ें न दिखाई दें तो तने की दिशा में एक फुट गहराई तक तब-तक खोदिए जब-तक पोषक जड़ों का जाल न मिल जाए।

४ः जहाँ पतली पोषक जड़ों के गुच्छे दिखाई दें वहाँ से बहुत ही सावधानी से धीरे-धीरे इन्हें बाहर निकालें।

५ः इन जड़ों के सिरे सिकेटीयर या बागवानी की विशेष कैचियों से काटिए।

६ः इनके कटे हुए सिरों को अमृत जल से धो डालिए।

७ः अब इन पर राख डालिए। राख रोगरोधी का काम करके इन्हें बीमारियों से बचाएगी।

८ः निकाली गई मिट्टी की जगह अमृत मिट्टी भरिए। पुरानी मिटटी को अमृत मिट्टी के ऊपर न डालें।

९ः मिट्टी में अमृत जल डालिए। ऐसा करने से पोषक तत्व जड़ों के लिए उपलब्ध अवस्था में आ जाएँगे।

१०ः अब अच्छी तरह ३ से ४ इंच का आच्छादन कर दीजिए। ऐसा करने से नमी बनी रहेगी और नई पोषक जड़ों का विकास जल्दी होगा।

११ः बरसात के मौसम में हर १५ दिनों में और ठंडी और गर्मी के मौसम में दो-दो माह बाद इस प्रक्रिया को बाकी बचे तीनों भागों पर दोहराइए।

बेलों की जड़ों का उपचार कैसे किया जाता है?

बेलों की जड़ों का उपचार करने की प्रक्रिया इस प्रकार है-

बेलों की पोषक जड़ों के पास सब्बल को ६ इंच की गहराई तक घुसाकर उसे ऊपर की ओर थोड़ा उठाना चाहिए। यह प्रक्रिया वेल की जड़ों के आसपास सभी दिशाओं में करनी चाहिए। ऐसा करने से पोषक जड़ों के आसपास की मिट्टी ढीली हो जाती है। इसके बाद प्रति वर्गफुट में ३० ग्राम राख की दर से बेल की छतरी के अनुसार अमृत जल से सिंचाई करने के पश्चात राख देनी चाहिये। यदि वेल अमृत मिट्टी में न लगाई गई हो तो पोषक जड़ों पर प्रति वर्गफुट ४ लीटर की दर से अमृत मिट्टी डालनी चाहिए।

फलदार पेड़ों की छँटनी पहले की जानी चाहिए या जड़ों का उपचार?

यह पौधे की अवस्था को देखकर तय करना चाहिए। यदि पौधे की हरी छतरी का विकास हुआ है और इसमें फल नहीं आ रहे हैं तो पहले इसकी जड़ों का उपचार करना होगा और उसके साथ ही छँटनी करनी होगी। दूसरी ओर यदि पेड़ की हरी छतरी का विकास न हुआ हो तो पहले इसकी छँटनी करके देखना चाहिए। यदि नई शाखाएँ नहीं फूटती हैं जड़ों का उपचार करना चाहिए। याद रखें छँटनी निर्धारित अंतराल के बाद नियमित करते रहना चाहिए।

पौधे द्वारा सूर्यप्रकाश से ली गई ऊर्जा, हवा, पानी और मिट्टी से लिए गए वजन को अलग-अलग कर कैसे देखा जा सकता है?

एक हरे पौधे को जड़ से उखाड़कर उसका वजन कीजिए। इस वजन को पौधे का गीलाभार यानि फ्रेशवेट कहते हैं। यह इसमें शामिल सभी पदार्थों और ऊर्जा का योग होता है। अब इस पौधे को सुखा लीजिए। इसमें से वह भाग लगभग निकल जाएगा जो उसने पानी से प्राप्त किया था। अब एक बार फिर इसका वजन कीजिए। यह इस पौधे का सूखा भार यानि ड्रायमास कहलाता है। गीले और सूखे भार में अंतर से पता चलता है कि उसने पानी लगभग कितने वजन का प्राप्त किया था। अब इस सूखे पौधे को अच्छी तरह जलाइए। इससे निकलने वाला प्रकाष और उष्मा वह भाग है जो इसने सूर्यप्रकाष से ऊर्जा के रुप में प्राप्त किया था। जलने के दौरान इससे निकलने वाला धुआं वह भाग है जो इसने हवा से प्राप्त किया था। आखिर में बची राख वह भाग है जो इसने मिट्टी से प्राप्त किया था। इस राख का वजन करने से पता चलता है कि पौधे ने मिट्टी से कितना वजन प्राप्त किया था।

 

पौधे के सूखे जैवभार में किस तत्व की कितनी हिस्सेदारी होती है ?

पौधे का ९८ प्रतिशत सूखा जैवभार मुख्य चार तत्वों से बना होता है।

इनकी हिस्सेदारी का विवरण इस प्रकार है-

कार्बन-४४ प्रतिशत, ऑक्सीजन-४४ प्रतिशत, हाइड्रोजन-६ प्रतिशत और नाइट्रोजन-४ प्रतिशत। ये चार तत्व पौधा हवा और पानी से लेता है। बाकी लगभग दो प्रतिशत भार २६ से अधिक तत्वों से मिलकर बना होता है। इन तत्वों को पौधा जमीन से लेता है।

अन्य प्रभावकारी संकल्पनाएँ

आच्छादन क्या है?

मिट्टी को ढंककर रखने को आच्छादन कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में मलचिंग कहते हैं।

आच्छादन कितने प्रकार का होता है?

ये मुख्यतः चार प्रकार की होती हैं-

१ः जीवंत आच्छादन या लाइव मलचिंग।

२ः सूखा आच्छादन या ड्राय मलचिंग।

३ः पत्थर आच्छादन या स्टोन मलचिंग।

४ः प्लास्टिक आच्छादन या प्लास्टिक मलचिंग।

इसके लाभ क्या हैं?

आच्छादन के निम्न लाभ हैं-

१ः यह अमृत मिट्टी की नमी को बचाकर रखती है।

२ः यह अमृत मिट्टी को बहने से रोकती है।

३ः यह खरपतवारों की संख्या कम करती है।

४ः जीवंत और सूखे आच्छादन के विघटन से ह्यूमस भी तैयार होता है।

. सूक्ष्म जीवों को सूर्यप्रकाश से होने वाले हानि से बचाता है।

. केचुओं को दिन रात काम करने में सहयोगी बनता है।

आच्छादन का इस्तेमाल करते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?

आच्छादन का उपयोग करते समय ये सावधानियाँ रखनी चाहिए-

१ः आच्छादन में इस्तेमाल सूखा या हरा जैविक कचरा पौधों के तने से छूना नहीं चाहिए। इसमें जमा नमी की वजह से तने को नुकसान होता है।

२ः सूखे आच्छादन को आग से बचाना चाहिए।

३ः आच्छादन की मात्रा ३-४ इंच रखनी चाहिए। ठंडे प्रदेशों में ज्यादा मोटा आच्छादन कर गर्मी बनाए रखी जाती है।

जीवंत आच्छादन के लिए कौन-कौन से बीज लगाने चाहिए?

जीवंत आच्छादन के लिए मुख्य पौधों की हरी छतरी से कम हरी छतरी वाले द्विदलीय बीज लगाने चाहिए।

आयुर्वेद के छः रस के अनुसार ढेर पर कौन से बीज लगाने चाहिए?

आयुर्वेद अनुसार छः रस के छह रस निम्न प्रकार के पौधों से प्राप्त किये जा सकते हैं -

१ः मीठा सौंफ

२ः तीखा मिर्ची

३ः कड़वा मैथी, करेला

४ः खट्टा अंबाड़ी, टमाटर

५ः कसेला ग्वारफल्ली

६ः नमकीन पालक

दृश्य उत्पादकता, प्राथमिक उत्पादकता और द्वितीयक उत्पादकता क्या है?

मिट्टी में प्रति हेक्टर पैदा हुए सूखे जैविक भार को उस मिट्टी की दृश्य उत्पादकता यानि विसीबल प्रॉडक्टीविटी कहा जाता है। इसे सूखा जैविक भार/हेक्टेयर में नापा जाता है।

मिट्टी की प्राथमिक उत्पादकता यानि प्रायमरी प्रॉडक्टीविटी वह होती है जो बाहरी साधनों के इस्तेमाल के बिना प्राप्त की जाती है। इसे सूखा जैविक भार/हेक्टेयर/किलो लीटर पानी में नापा जाता है।

मिट्टी में बाहर से पानी लाकर डालने, उर्वरक डालने और रोगनाशकों का इस्तेमाल करने से प्राप्त उत्पादकता को द्वितीयक उत्पादकता यानि सेकेंडरी प्रॉडक्टीविटी कहते हैं।

दृश्य उत्पादकता, प्राथमिक उत्पादकता और द्वितीयक उत्पादकता का योग होती है। यानि ये दोनों के मिलने से तैयार होती है।

अनुसंधानों से पता चला है कि सिंचाई के साधनों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से मिट्टी की दृश्य उत्पादकता और द्वितीयक उत्पादकता कुछ समय के लिए बढ़ती है लेकिन प्राथमिक उत्पादकता लंबे समय के लिए खत्म हो जाती है।

माननीय श्री सुदर्षन जी को लगता है कि हरित क्रांति से दृष्य उत्पादकता और द्वितीयक उत्पादकता बढ़ी है जबकि प्राथमिक उत्पादकता काफी घट गई है। इसका कारण है कि पौधों के विकास के लिए १८-१९ तत्वों की आवश्यकता होती है जबकि रासायनिक खाद में केवल ७-८ तत्व ही होते हैं। अतः उन तत्वों की पूर्ति हो जाती है किंतु बाकी के १०-११ तत्व वे जमीन से लेते हैं। जब तक ये तत्व खेत की जमीन में विद्यमान हैं तब तक तो फसल का उत्पादन बढ़ता है, जब ये तत्व समाप्त हो जाते हैं तो फसल का उत्पादन घटने लगता है। किसान और अधिक रासायनिक खाद यह सोचकर डालता है कि अगली बार फसल अच्छी आएगी और बैंक से लिया कर्ज वापस कर दूंगा, किंतु फसल का उत्पादन घटता जाता है और कर्ज का भार बढ़ता जाता है। अंत में किसान अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आत्महत्या का सहारा लेता है। देश में अब तक लगभग दो लाख किसानों की आत्महत्या का यही कारण है।

सूर्यप्रकाश और पौधों की उत्पादकता में क्या गणितीय संबंध है?

एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रति वर्गफुट प्रतिदिन सूर्य से प्रकाश और उश्मा के रुप में १२५० किलो कैलोरी ऊर्जा आती है। पर्णांक (लीफ इंडेक्स) के अनुसार पौधे के परिपक्व पत्ते इस ऊर्जा का मात्र एक से डेढ़ (१२से१६ किलो कैलोरी) प्रतिशत उपयोग कर पाते हैं। इस ऊर्जा से वे करीब ३ से ४ ग्राम सूखा भोजन-ग्लुकोस तैयार करते हैं। इसमें से एक ग्राम रोजाना पौधों की शारीरिक क्रियाओं में खर्च हो जाता है। एक ग्राम पौधों के शारीरिक विकास में खर्च होता है। बचा हुआ एक ग्राम या दो ग्राम भावी खाद्य पदार्थ के रुप में जमा रहता है।

अमृत मिट्टी में लगे पौधों को पानी किस प्रकार देना चाहिए?

पौधों को अमृत मिट्टी से पोषक तत्व लेने के लिए सिर्फ नमी की जरुरत होती है। ज्यादा पानी देने से जड़ें ज्यादा पोषक तत्व लेती हैं यह धारणा सही नहीं है। ज्यादा पानी देने से हवा की अनुपस्थिति में अमृत मिट्टी का प्रभाव कम हो जाता है और जड़ों को भी नुकसान होता है। इसलिए अमृत मिट्टी में लगे पौधों को उद्यान नलिका (गार्डन पाइप) से ही पानी देना चाहिए। पानी की बचत और अमृत मिट्टी के बहाव को रोकने के लिए इसे हमेशा आच्छादन (मलचिंग) करके रखना चाहिए। पानी पौधे के तने के पास नहीं देना चाहिए। पानी हरी छतरी (कैनोपी) के नीचे वहां देना चाहिए जहां पोषक जड़ों का जाल होता है। सुबह सूर्योदय से पहले और संध्या को सूर्यास्त के बाद पौधों को पानी देने से वाष्पीकरण और इससे पैदा होने वाली गर्मी कम होती है।

 

उद्यान नलिका (गार्डन पाइप) से सिंचाई करने पर होती है पानी बचत।

आर्द्रता मंडप क्या है?

यह बहुत ही कम पानी और कम जगह (१०फुट लंबाई, ४फुट चौड़ाई, ४फुट ऊंचाई) में बनाई जा सकने वाली पौधशाला (नर्सरी) है। इसमें कलमों की जडें+ जल्दी तैयार की जा सकती हैं। इसमें धनिया, पुदीना जैसे खुशबुदार और छांव पसंद करने वाले पौधे तेजी से बढ़ते हैं। इसमें बीजों से रोपे तैयार किए जा सकते हैं।

आर्द्रता मंडप बनाने में कौन सी सामग्री लगती है?

आर्द्रता मंडप बनाने में लगने वाली सामग्री इस प्रकार है-

१ः २०० गेज वाला १० फुट लंबा और ४ फुट चौड़ा काला पॉलीथीन ।

२ः ८० ईंटे ।

३ः करीब ५०० लीटर अमृत मिट्टी (लगभग एक ढेर)

४ः ७ फुट लंबी पांच बांस की पठ्ठियां।

५ः १० फुट लंबा बीच से फाड़ा गया बांस।

६ः १२ फुट लंबा और ८ फुट चौड़ा १५० गेज का पारदर्षक पॉलीथीन।

आर्द्रता मंडप कैसे बनाया जाता है?

बनाने का तरीका-

१ः सबसे पहले २०० गेज का १० फुट लंबा और ४ फुट चौड़ा काला पॉलीथीन बिछाया जाता है। इससे पानी जमीन में झिरता नहीं है।

२ः पॉलीथीन के चारों ओर ६ इंच ऊँचाई की ईंटों की दीवार तैयार की जाती है। यह अमृत मिट्टी को बहने से रोकती है। इसके लिए करीब ८० ईंटे लगती हैं।

३ः अब पॉलीथीन के ऊपर लगभग ५०० लीटर अमृत मिट्टी डाली जाती है।

४ः अब इस पर मंडप तैयार करने के लिए १० फुट लंबी पाँच बाँस की पट्टियाँ धनुषाकार मोड़ कर इनके दोनों सिरे चौड़ाई की दिशा में ईंटों के पास मिट्टी में फंसा दिए जाते हैं। इन पट्टियों के बीच का अंतर २ फुट होता है।

५ः इन पट्टियों को मजबूती से बांधे रखने के लिए १० फुट लंबा बीच से फाड़ा गया बांस लगाकर इन्हें आपस में बांधा जाता है।

६ः बाँस की पट्टियों के इस ढाँचे पर १२ फुट लंबा और ८ फुट चौड़ा १५० गेज का पारदर्षक पॉलीथीन डाला जाता है। इसकी सीमा पर चारों ओर ईंटें रखकर मंडप को बंद कर दिया जाता है। पॉलीथीन पारदर्षक होने से सूर्यप्रकाश इसके अंदर जाता रहता है। साथ ही अंदर की नमी भाप बनकर इस पर जमा होती है और बाहर का तापमान कम होने पर वापस इसमें ही ओस के रूप में गिर जाती है। इसलिए इसमें पानी बहुत कम देना पड़ता है। सभी ओर से पॉलीथीन से घिरे इस मंडप में पौधे लगाए जा सकते हैं और कलमों की जडें+ जल्दी तैयार की जा सकती हैं। खुशबूदार पौधों की सुगंध और ताजगी इसमें बरकरार रहती है। इसका उपयोग एक छोटी पौधशाला की तरह किया जा सकता है।

आर्द्रता मंडप बनाते समय कौन-कौनसी सावधानियाँ बरतनी चाहिए?

आर्द्रता मंडप बनाते समय ये सावधानियां बरतनी चाहिए-

१ः इसे ऐसी जगह बनाएँ जहाँ तेज हवा से इसका पारदर्षक पॉलीथीन न फटे।

२ः इसे ऐसी जगह बनाएँ जहाँ धूप बहुत ज्यादा न पड़ती हो। तेज धूप में पॉलीथीन जल्दी गल जाता है और मंडप के अंदर गरमाहट बढ़ने से पौधे मुरझा जाते हैं।

३ः हवा के आवागमन के लिए इसे रोजाना एक घंटे लंबाई के दोनों सिरों की ओर से खोलकर रखना चाहिए।

गंगा माँ मंडल क्या है?

एक छोटे परिवार (पति, पत्नी और दो बच्चे) को लगने वाले सभी पोषक तत्वों, सब्जियों और फलों द्वारा कम जगह (१००० वर्गफुट से भी कम) में प्राप्त करने के लिए यह ढाँचा तैयार किया जाता है। इसमें वनोषधियां भी लगाई जाती हैं। इसका उद्देश्य्य जैविक सब्जियों के लिए परिवार की बाजार पर निर्भरता कम करना और परिवार के सदस्यों की पोषण की जरुरत को पूरा करना है और स्व-सहायता के लिए उपयोगी है।

 

गंगा माँ मंडल तैयार करने के लिए क्या सामग्री लगती है?

इसे तैयार करने में लगने वाली सामग्री इस प्रकार है-

१ः कम से कम १५ फुट लंबाई नाप सकने वाला फीता (टेप)

२ः नक्षा तैयार करने के लिए पाँच किलो राख या चूना।

३ः कम से कम १६ फुट लंबी रस्सी।

४ः लकड़ी की एक खूँटी।

५ः करीब ५० मजबूत बल्लियाँ या बाँस।

६ः दो किलो रस्सी।

७ः छह माह में विघटित हो सकने वाला ५ किलो जैविक कचरा।

८ः छह माह से पहले विघटित हो सकने वाला ५ किलो जैविक कचरा।

९ः करीब ४ वर्गफुट का एक पत्थर या चीप।

१०ः एक कुदाल, एक फावड़ा, एक घमेला और एक सहयोगी।

 

 

ये है गंगा माँ मंडल की प्रतिकृति।

 

गंगा माँ मंडल तैयार करने का तरीका क्या है?

इसे तैयार करने का तरीका इस प्रकार है-

१ः वर्ग के आकार की १००० वर्गफुट जगह के ठीक बीच में खूँटी गाड़कर उसमें १५ फुट लंबाई नाप सकने वाली रस्सी बँाधिए। अब इस रस्सी की सहायता से खँूटी से १५ फुट दूर एक गोलाकार घेरा खींचिए। इसकी सीमा पर राख डालिए ताकि यह दिखाई दे सके।

२ः अब खँूटी से क्रमशः १०., , , ., ३ फुट पर गोल घेरे खींचिए। और इनकी सीमा पर राख डालिए।

३ः सबसे बाहरी घेरे की परिधि पर टेप रखकर उसके १३.५ फुट लंबाई वाले इसके ७ समान भाग कीजिए। राख डालकर निशान लगाते रहें।

४ः ऐसे दो भाग जहाँ मिलते हैं, उसे मध्य बिंदु मानकर ४.५ फुट के घेरे तक एक सीधी रेखा खींचिए। इस रेखा के दोनों ओर ९-९ इंच नापकर ४.५ फुट के घेरे तक दो सीधी लाइनें खींचिए। इस प्रकार इन दोनों रेखाओं के बीच १.५ फुट का एक रास्ता तैयार हो जाएगा। यह रास्ता बाहरी घेरे से ४.५ फुट के घेरे तक जाएगा।

५ः बाहरी घेरे पर बनाए गए सभी ७ भागों के बीच इसी प्रकार १.५ फुट चौडे ७ रास्ते बनाइए।

६ः अब सबसे अंदर वाले ३ फुट के घेरे को कुप्पी यानि फनल के आकार में २ फुट गहरा खोदिए। इस गड्ढे में ऐसी जैविक वस्तुएँ डालिए जिन्हें विघटित होने में ६ माह से ज्यादा लगते हैं। जैसे-नारियल की जटाएँ, तूर, कपास और पौधों की डालियाँ, गन्ने का बगास आदि। देर से विघटित होने वाली चीजों को नीचे और जल्दी विघटित होने वाली वस्तुओं को इनके ऊपर डालिए। जैसे-पेड़ों के सूखे पत्ते।

७ः सबसे अंदर के गड्ढे को भरने के बाद उस पर एक इतना बड़ा पत्थर रखा जाता है जिस पर बैठकर नहाया जा सके या बर्तन और कपड़े धोए जा सकें।

८ः सभी रास्तों के दोनों और बाँस और बल्लियाँ गाड़कर मंडप तैयार किया जाता है। इस मंडप के ऊपर रस्सी का जाल तैयार किया जाता है।

९ः रास्तों को छोड़कर बची जगहों पर सीधे ढेर लगाए जा सकते हैं या कहीं ओर तैयार अमृत मिट्टी यहाँ लाकर डाली जा सकती है। पहले तरीके से ज्यादा फायदा होता है। इस तरीके से अमृत मिट्टी कम नहीं पड़ती और सूक्ष्मजीवों द्वारा तैयार सभी जैविक रसायन पौधों की जड़ों को मिलते हैं।

गंगा माँ मंडल बनाते समय रखी जाने वाली सावधानियाँ क्या हैं?

सावधानियाँ इस प्रकार हैं-

१ः गंगा माँ मंडल ऐसी जगह बनाना चाहिए जहां तेज हवाओं से बेल वर्गीय पौधे न टूटें।

२ः जहाँ ज्यादा समय तक धूप पड़ती हो।

३ः जहाँ पशुओं से इसकी सुरक्षा हो सके।

४ः जहाँ घरेलू कामों (नहाना, कपड़े धोना, बर्तन धोना आदि) में उपयोग हो चुका ज्यादा से ज्यादा पानी इसमें जा सके। इस पानी में बाजारु रसायनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

५ः बेल वर्गीय पौधों को ढेर और रास्तों पर नहीं फैलने देना चाहिए। इन्हें मंडप के ऊपर ही फैलने देना चाहिए। इन्हें वहाँ तक पहुँचाने के लिए रस्सियाँ बाँधनी चाहिए।

. गंगा माँ मंडल रसोईघर के पास बनाया जाए। ऐसा करने से रसोई का पानी और जैविक कचरा गंगा माँ मंडल तक पहुँचाना आसान और सुविधाजनक होगा। साथ रसोई तक सब्जियाँ भी आसानी से पहुँचाई जा सकेंगी।

गंगा माँ मंडल में पौधे किस तरह लगाने चाहिए?

इसका कोई निर्धारित तरीका नहीं है लेकिन इस संबंध में सुझाव इस प्रकार हैं-

१ः गंगा मां मंडल के केंद्र की ओर जाने वाले सभी रास्तों के दोनों ओर ढेरों पर बेलवर्गीय पौधे लगाए जाते हैं। इन बेलवर्गीय पौधों को रस्सियाँ बाँधकर मंडप पर चढ़ाया जाना चाहिए।

२ः बाहर की ७ बड़ी ढेरस पर प्याज, लहसुन मूली, शकरकंद और आलू जैसी कंद सब्जियाँ। टमाटर, बैंगन और भिंडी जैसी फलदार सब्जियाँ। तुलसी, पुदीना, कढ़ी पत्ता जैसे औषधीय पौधे लगाने चाहिए।

३ः अंदर के ७ छोटे ढेरों पर मेथी, चायपत्ती, मिर्ची, धनिया जैसे मसाले। बरबरटी, ग्वारफल्ली, तूर, मूँग, उड़द और सेम जैसे प्रोटीनयुक्त पौधे लगाने चाहिए।

४ः सबसे अंदर के गोल घेरे में नमी ज्यादा रहती है इसलिए यहां केले, पपीते के पौधे लगाए जा सकते हैं।

चौथाई एकड़ खेती क्या है?

एक एकड़ का चौथा हिस्सा यानि लगभग १० हजार वर्गफुट में एक छोटे परिवार (पति, पत्नी, माता-पिता और एक बच्चा) के भोजन, आवास और ईंधन की व्यवस्था करने वाली खेती की एक संकल्पना है। इसे दस गुंठा खेती भी कहा जाता है। 'गुंठा' जमीन मापने की एक ईकाई है। एक गुंठे में लगभग एक हजार वर्गफुट होते हैं।

इसके महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं-

१ः परिवार को लगने वाली सब्जियाँ, अनाज, फल, तिलहन, तेल बीज खुद ही पैदा किए जाते हैं।

२ः खेत को जोतने की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि सारी फसलें अमृत मिट्टी में लगाई जाती हैं।

३ः साल-दर-साल अपने ही बीजों का उपयोग किया जाता है जिससे बीज का खर्च भी कम होता जाता है।

४ः यह खेती कम पानी में की जाती है।

५ः इसके उत्पाद तुलनात्मक रुप से अधिक ज्यादा गुणकारी एवं पौष्टिक होते हैं।

 

चौथाई एकड़ खेती का नक्षा कैसा है?

इस संकल्पना का नक्षा इस प्रकार है-

१ः खेती की इस पद्धति में एक हजार वर्गफुट जगह घर के लिए होती है।

२ः ५०० वर्गफुट जगह आँगन के लिए रखी जाती है।

३ः एक हजार वर्गफुट जगह बारिश के पानी को जमा करने के लिए तालाब या कुँआ बनाने के लिए रखी जाती है।

४ः ५०० वर्गफुट जगह गोदाम के लिए रखी जाती है।

५ः बची हुई सात हजार वर्गफुट जगह में अमृत मिट्टी पर खेती की जाती है। इसमें से करीब १००० वर्गफुट जगह में सब्जियाँ लगाई जाती हैं। १००० वर्गफुट में फल उद्यान के पौधे लगाए जाते हैं। इसमें घर और खेत के चारों ओर ५ फुट के पट्टे में फूलों के पौधे और मुनगा, अरंडी, गिलिरिशिडिया, शेवरी, हातगा, बोगनवेलिया जैसे १५ पेड़ लगाए जाते हैं सजीव बागड़ के रुप में ।

६ः बाकी बची जगह में तिलहन, मसाला, कपास की फसल को लगाया जाता है। इन पेड़ों के बीच में मौसम के मुताबिक अनाज, तेल बीज और मसालों के पौधे लगाए जाते हैं।

खाद्य अंतर (फूड माइल) क्या है?

हम जो भी खाते हैं वह किसी न किसी जगह पर उत्पन्न पदार्थ होता है। हमारे और उस जगह के बीच के अंतर को खाद्य अंतर कहते हैं। मान लीजिए आप मध्यप्रदेश के किसी गाँव में बैठकर एक आम खा रहे हैं। यह आम आंध्रप्रदेश के किसी गाँव के पेड़ से तोड़कर आप तक पहुँचाया गया है। अब आपके और उस पेड़ के बीच की दूरी को खाद्य अंतर कहा जाएगा। अंग्रेजी में इसे फूड माइल कहते हैं। इसे आमतौर पर मील में नापा जाता है। खाद्य अंतर जितना ज्यादा होगा आप तक खाद्य पदार्थ पहुँचाने में उतनी ज्यादा ऊर्जा खर्च होगी। यह ऊर्जा जैविक ईंधनों का इस्तेमाल कर हासिल की जाती है। इनका बढ़ता उपयोग पर्यावरण के लिए घातक होता जा रहा है। आमतौर पर दूर से आने वाले खाद्य पदार्थों के दाम भी ज्यादा होते हैं। अतः फूड माइल जितना कम हो उतना आपके और पर्यावरण के लिए अच्छा है। आसान वाक्यों में कहें तो आप अपने खेत और गाँव में पैदा अनाज, फल, सब्जियाँ, मसाले और अन्य चीजें जितनी ज्यादा खाएंगे उतना ही ज्यादा फायदा आपको और पर्यावरण को होगा।

पर्यावरणीय पदचिन्ह (इकोलॉजिकल फुट प्रिंट) क्या है?

कुछ लोग बहुत कम सामान में जी लेते हैं तो कुछ को जीने के लिए बहुत ज्यादा सामान लगता है। इनका कच्चा माल खेतों, जंगलों, बगीचों, खदानों और जल स्रोतों में पैदा होता है और जमीन पर बनी इमारतों में इन्हें तैयार किया जाता है। लोग यदि इनका ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो इन्हें पैदा करने या बनाने के लिए ज्यादा कच्चे माल और जमीन की जरुरत पड़ती है।

किसी खास क्षेत्र के गाँव के एक आम इन्सान को जीने के लिए जितने सामान की आवश्यकता होती है उतना सामान पैदा करने के लिए जितनी जमीन की जरुरत होती है, उसे उस व्यक्ति का पर्यावरणीय पदचिन्ह कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे इकोलॉजिकल फुट प्रिंट कहते हैं। इसे हेक्टेयर में मापा जाता है। अब यदि शहर में रहने वाला कोई व्यक्ति होगा तो उसे ज्यादा वस्तुओं की आवश्यकता पडे+गी। अतः उन्हें पैदा करने या बनाने के लिए भी ज्यादा जमीन की जरुरत पडे+गी।

दुनियाँ के कुछ इलाकों के आदिवासी बहुत कम सामान में जी लेते हैं। इसलिए उनका पर्यावरणीय पदचिन्ह आमतौर पर बहुत छोटा होता है। जबकि दुनिया के कुछ बहुत महँगे शहरों में विलासितापूर्ण जीवन जीने वाले लोगों का पर्यावरणीय पदचिन्ह बहुत बड़ा होता है। एक क्षेत्र विशेष के लोगों का यदि खाद्य क्षेत्र कम होगा तो वहाँ ज्यादा जनसंख्या रह सकती है। यदि उनका पर्यावरणीय पदचिन्ह ज्यादा होगा तो वहाँ कम जनसंख्या ही रह सकेगी।

बहुस्तरीय खेती (मल्टीटीयर फार्मिंग) क्या है?

आमतौर पर यह माना जाता है कि बडे+-पेड़ों के नीचे दूसरे पेड़-पौधे नहीं लगाने चाहिए, क्योंकि उनका विकास नहीं हो पाता है। लेकिन प्राकृतिक घने जंगलों में देखें तो बडे+ पेड़ों पर कई लताएँ होती हैं। इन पेड़ों के नीचे कई तरह की झाड़ियाँ, वनस्पतियाँ और घास होती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी का विकास भी अच्छा होता है।

जंगलों का अध्ययन करने वाले कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सभी प्रकार के पेड़-पौधे, झाडियाँ-वनस्पतियाँ और भिन्न प्रकार की घासें मिलकर एक परिवार की तरह रहते हैं। ये सूर्यप्रकाश और पानी के लिए एक-दूसरे से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करते हैं और दूसरी ओर पोषक तत्वों की पूर्ति में एक-दूसरे की मदद करते हैं। घास का जीवन चक्र बहुत छोटा होता है। ये बरसात के मौसम में भरपूर नमी का फायदा उठाकर मिट्टी के पोषक तत्व खुद में जमा कर लेती है। बरसात का मौसम खत्म होने के बाद ये सूखकर विघटित होने लगती हैं। इनके विघटित होने से बडे+-पेड़ों बौर झाड़ियों को खाद के रुप में पोषक तत्व मिलते हैं।

घास की तरह ही झाड़ियों और बेलों की उम्र पेड़ों से कम होती है। ये सूखकर विघटित होने के बाद बडे+ पेड़ों के लिए खाद का काम करते हैं। बडे+ पेड़ हर साल अपनी पत्तियाँ गिराते हैं। इनके सूखकर विघटित होने से जो खाद तैयार होती है वह घास और झाड़ियों को बढ़ने में मदद करती है। अलग-अलग घास, झाड़ियाँ और पेड़ मिट्टी से भिन्न-भिन्न पोषक तत्व खींचकर जमा करते हैं। इनकी खाद में ये तत्व सहज उपलब्ध होते हैं जिससे दूसरे किस्म के पौधों को ये तत्व इनकी खाद से आसानी से मिल जाते हैं।

प्रकृति के काम करने के तरीके को समझकर यदि फलों के बडे+ पेड़ों के नीचे मसालों और दालों की झाडियाँ, सब्जियों की जड़ी-बूटियाँ और अनाजों की घास लगाई जाए तो भरपूर उत्पादन मिल सकता है। बडे+ पेड़ों के नीचे कई प्रकार की उपयोगी झाड़ियाँ, जड़ी-बूटियाँ और घास लगाने के तरीके को बहुस्तरीय खेती कहते हैं। इसे अंग्रेजी में मल्टीटीयर फार्मिंग कहा जाता है।

उदाहरण के लिए एक बडे+ पेड़ के नीचे यदि ४ प्रकार के उपयोगी पौधे लगाए गए तो उसे ४ स्तरीय खेती कहेंगे। यदि एक बडे+ पेड़ के नीचे ६ प्रकार के उपयोगी पौधे लगाए गए तो उसे ६ स्तरीय खेती कहेंगे।

खेती की इस पद्धति में पेड़-पौधों के जीवन काल और उत्पादन के समय को ध्यान में रखकर इन्हें लगाया जाता है। पहले अल्पजीवी (४ माह में उत्पादन देने वाले) पौधे अपना विकास कर उत्पादन देते हैं। उनके बाद मध्यमजीवी (एक साल से तीन साल पहले उत्पादन देने वाले) पौधे उत्पादन देते हैं। और अंत में दीर्घजीवी (तीन साल से अधिक या उसके बाद उत्पादन देने वाले) उत्पादन देते हैं।

जीवंत उत्पादक बागड़ (लाइव प्रॉडक्टिव फेन्सिंग) किसे कहते हैं?

खेतों को पशुओं से बचाने के लिए जो बागड़ बनाई जाती है। वह आमतौर पर सूखी कटीली झाड़ियों से बनाई जाती है। इसके लिए लगने वाली जगह से कोई उत्पादन नहीं मिलता है। इस जगह का उपयोग उत्पादन के लिए करने का एक तरीका है जीवंत उत्पादक बागड़। इसे अंग्रेजी में लाइव प्रॉडक्टिव फेन्सिंग कहा जाता है। इसमें घर और खेत के चारों ओर ५ फुट का पट्टा लेकर इसमें फूलों के पौधे और मुनगा, अरंडी, गिलिरिशिडिया, शेवरी, हातगा, हल्दी, अदरक, लेमन ग्रास, सीताफल, आंवला, रीठा, झेंडू, करौंदे, चिरोंजी, मीठी नीम, शतावरी, तुलसी, हाड़जोड़, केतकी, ओलीवीरा जैसे पेड़ लगाए जाते हैं। इसमें बोगनवेलिया और हरी रहने वाली कँटीली झाड़ियाँ भी लगाई जाती हैं।

जीवंत उत्पादक बागड़ के लाभ क्या हैं?

इसके कई फायदे हैं जैसे-

१ः मुनगा, गिलिरिशिडिया, शेवरी जैसे पेड़ों के पत्ते गिरने से खेत की मिट्टी उपजाऊ बनती है।

२ः मुनगा, हल्दी, लेमन ग्रास, अदरक से उत्पादन मिलता है।

३ः रंग-बिरंगे फूलों से सुंदरता बढ़ती है।

४ः पेड़ों पर बैठने वाले पक्षी कीटों को खाकर उन्हें नियंत्रित करते हैं।

५ः पेड़ तेज हवाओं को रोककर फसलों को होने वाला नुकसान कम करते हैं।

६ः पेड़ों से इर्ंधन के लिए जलाऊ लकड़ी मिलती है।

७ः यदि कुछ बाँस के कंद लगाए जाएँ तो वे भी अच्छा उत्पादन दे सकते हैं। मकान की लकड़ी की माँग भी पूरी करते हैं।

८ः खस जैसे पौधे लगाने से खेतों में आने वाले विशैले पानी स्वच्छ होता है।

९ः औषधीय पौधे भी लगाए जा सकते हैं।

१०ः पशुओं के लिए पौष्टिक चारा मिल सकता है।

११ः गर्मियों में खेत का तापमान कम होता है।

फसलों का चक्रण क्या है?

बीज दो प्रकार के होते हैं-एक दलीय और द्विदलीय। एक दलीय और द्विदलीय बीजों को एक के बाद एक लगाने से जमीन में नाइट्रोजन की कमी नहीं होती। इस संकल्पना को ध्यान में रखकर अनुभवी किसानों द्वारा सुझाए गए कुछ नमूने इस प्रकार हैं-

बरसात में मूँगफल्ली, मूँग दाल, उड़द, सोयाबीन के बाद ठंड में गेंहू, मक्का, ज्वार, बाजरा लगाना। बरसात में धान, मक्का, बाजरी, ज्वार के बाद ठंड में चना या मूंगफल्ली लगाना।

सहायक पौधे क्या होते हैं?

एक-दूसरों को कीटों से बचाने वाले या पोषक तत्वों की उपलब्धता में मदद करने वाले पौधों को सहायक पौधे कहते हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

१ः बैगन गेंदा, सब्जा, तिल

२ः टमाटर पत्तागोभी, गेंदा, अरंडी, शेवंती

३ः भिंडी गेंदा

४ः गोभी राई, आलू, लहसून, प्याज

५ः ककडी मक्का

६ः मटर गाजर, शलजम, मूली, मक्का

७ः आलू मक्का, गोभी, गेंदा

८ः अदरक तूअरदाल

९ः हल्दी अरंडी, मिर्ची

१०ः ज्वार मूंगदाल, बरबटी

११ः गेहूं चना

१२ः बीट प्याज

१३ः कद्दू मक्का

१४ः मूली मटर

१५ः गाजर प्याज, मूली, टमाटर

१६ः तिल मक्का, ज्वार

१७ः कपास बरबटी, अंबाड़ी, गेंदा, तूर, मक्का भिंडी

कीटों को दूर रखने वाले पौधे कौन से हैं?

कुछ पौधे ऐसे होते हैं जिनकी गंध कीड़ों को पसंद नहीं होती। कीडे+ इनसे दूर रहना पसंद करते हैं। उनके इस स्वभाव का फायदा उठाकर फसलों को कीड़ों से बचाया जा सकता है। ऐसे पौधे हैं- अरंडी, डीकामाली, सब्जा और आष्टा।

कीटों को आकर्षित करने वाले पौधे कौन से हैं?

कुछ पौधों की गंध कीटों को आकर्षित करती है। इन्हें फसलों के बीच में लगाकर कीटों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। ऐसे पौधे हैं- बरबटी, राई या सरसों, झेंडू, शेर आदि। बरबटी और राई पर मावा कीट जमा होते हैं। इससे मुख्य फसल बच जाती है।

कीटों में भ्रम पैदा करने वाले पौधे किस प्रकार काम करते हैं?

कुछ पौधे कीटों में भ्रम पैदा कर देते हैं। इसकी वजह से उनकी संख्या वृद्धि नहीं होती या अधिकतर मर जाते हैं। उदाहरण के लिए कपास के साथ मक्के के कुछ पौधे लगाने से बोंड में लगने वाली इल्ली भ्रमित होकर कपास के फूलों की जगह मक्के के तुर्रे पर अंडे दे देती है। वहां कपास के फूलों का खाद्य इल्ली के बच्चों को न मिलने से उनका जीवन खत्म हो जाता है। मक्के के तुर्रों को जमा कर इल्लियों को खत्म करना भी आसान हो जाता है।

फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को खाने वाले पक्षी कौन से हैं?

हमारे देश में पाए जाने वाले ऐसे कुछ पक्षी हैं-

१ः नीलकंठ

२ः भारद्वाज

३ः दरजिन चिड़िया

४ः बुलबुल

५ः कठफोड़वा

६ः रॉबिन

७ः कोतवाल

८ः उल्लू

९ः बाज

१०ः घूबड़

प्रकाश जाल क्या है?

रात में फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कुछ कीडे+ सफेद प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। इस गुण का इस्तेमाल करके भी कीट नियंत्रण किया जा सकता है। २५ वॉट का एक सीएफएल लगाकर चौथाई एकड़ में कीट नियंत्रण किया जा सकता है। खेत के बीच में फसलों से २ फुट की ऊँचाई पर इसे लगाकर इसके नीचे पानी से आधा भरा हुआ चौडे+ मुँह वाला बर्तन जैसे परात रख दिया जाता है। इसमें थोड़ा सा खराब या सस्ता तेल डाल दिया जाता है। कीडे+ इस पानी पर बैठने की कोशिष करते हैं और तेल से चिपक कर मर जाते हैं।

बीज संस्कार क्या है?

आयुर्वेद में औषधि के साथ अनुपान बताया गया है ताकि औषधि का गुण बढ़े। ठीक उसी तरह बीज को संस्कारित करने से उसके अंकुरित पौधों का जीवनकाल भी लंबा और सक्षम बना रहता है। इस विज्ञान को आत्मसात करने से किसान अच्छे सशक्त पौधे, जिनकी प्रतिकारशक्ति महत्तम होगी, लगा पाएगा। प्रथम बीज का चयन करें, उसे अमृत जल में डुबाएँ, जो बीज तैरने लगेंगे उन्हें निकाल लें। इससे ज्यादा बीज अंकुरण क्षमता वाले मिलेंगें, बीज का आयतन तय करें। उतने ही प्रमाण में मुख्य बीज से जिसकी घटा कम हो, ऐसे ४ से ६ बीज चयन करें, जिसमें द्विदलीय बीज होना जरुरी है। उदाहरण के रुप में ज्वार की फसल लेनी है तो उसके आयतन के प्रमाण में मेथी, मूँग, धनिया, सरसों आदि बीज लें। इस दोनों के आयतन के प्रमाण में रखिया, ताजा गोबर जिस खेत में लगाने वाले हों, उस खेत की अलग-अलग जगह से एकत्रित की हुई मिट्टी लें और सफेद चीटी की मिट्टी लें। इन सबका अच्छी तरह से मिला लें और गोमूत्र से गूँथकर छोटी गोलियाँ बना लें। इसे छाँव में सुखा लें और जिस खेत में ज्वार लगानी है वहाँ पर योग्य अंतर पर जमीन पर ही रख दें, उसको आच्छादित कर दें और जल दें। इस विधि से बीज अंकुरित